फतेह लाइव, रिपोर्टर.
पूर्वी सिंहभूम के सबसे बड़े सरकारी अस्पतालों में से एक सदर अस्पताल, खासमहल (जमशेदपुर) इस समय विवादों के केंद्र में है. अस्पताल की प्रशासनिक व्यवस्था और सिविल सर्जन के एक हालिया आदेश ने स्वास्थ्य महकमे में खलबली मचा दी है. एक तरफ जहां अस्पताल का आईसीयू (ICU) और फैब्रिकेटेड वार्ड डॉक्टरों और टेक्नीशियनों की भारी कमी के कारण दम तोड़ रहा है, डायलिसिस वार्ड बंद पड़े हैं, और गरीब मरीज दवाओं तथा मुकम्मल इलाज के लिए तरस रहे हैं. वहीं दूसरी तरफ नियमों को ताक पर रखकर चहेतों को मलाईदार कुर्सियां बांटने का खेल बदस्तूर जारी है.
पूरा मामला आरसीएच (RCH) कार्यालय के एक कंप्यूटर सहायक को अस्पताल का ‘ऑपरेशन इंचार्ज’ (हॉस्पिटल मैनेजर) बनाए जाने से जुड़ा है, जिसके पीछे हितों के टकराव और लाखों रुपये के टेंडर-सप्लाई का एक ऐसा गठजोड़ सामने आया है, जिसने झारखंड सेवा नियमावली के प्रावधानों की धज्जियां उड़ा कर रख दी हैं. आइए जानते हैं क्या है सरकारी रसूख, पति-पत्नी की जुगलबंदी और अस्पताल के भीतर चल रहे इस खेल की पूरी इनसाइड स्टोरी…
दवाइयों का टोटा और रसूखदारों का कोटा: मरीजों को इलाज नहीं मिल रहा, पर कंप्यूटर बाबू को ‘मैनेजर’ की कमान सौंप दी गई है
पति-पत्नी का सिंडिकेट: कंप्यूटर सहायक खुद अस्पताल की जरूरतें तय कर रहा है और उनकी पत्नी के नाम पर चल रही फर्म ‘जय माता दी एंटरप्राइजेज’ उसी सामान की सप्लाई कर रही है
सिविल सर्जन पर सवाल: दो-दो उपाधीक्षकों के होते हुए एक डेटा एंट्री ऑपरेटर को इतनी बड़ी जिम्मेदारी देना वित्तीय कदाचार की ओर इशारा करता है
जमशेदपुर सदर अस्पताल की प्रशासनिक व्यवस्था और सिविल सर्जन के एक हालिया आदेश को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं. आरसीएच (RCH) कार्यालय में पदस्थापित कंप्यूटर सहायक विमल कुमार मंडल को अस्पताल का ‘ऑपरेशन इंचार्ज’ (हॉस्पिटल मैनेजर) बनाए जाने के बाद नियमों के कथित उल्लंघन और हितों के टकराव का एक बड़ा मामला सामने आया है.
आरोप हैं कि सरकारी सेवा में कार्यरत कंप्यूटर सहायक की पत्नी के नाम पर ‘जय माता दी एंटरप्राइजेज’ नामक कंपनी संचालित हो रही है, जो सिविल सर्जन कार्यालय, सदर अस्पताल और जिले के कई सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों (CHCs) में विभिन्न सामग्रियों की आपूर्ति (सप्लाई) कर रही है. इस कंपनी के लिए आपूर्ति होने वाले सामानों की सूची तैयार करने से लेकर आपूर्ति तक की काम एक ही परिवार के जिम्मे होने की बात कही जा रही है.
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- सिविल सर्जन का कारनामा, चहेते कंप्यूटर सहायक को बना दिया हॉस्पीटल मैनेजर!, डाॅक्टर से लेकर नर्स तक परेशान
दिलचस्प है कि जमशेदपुर के सिविल सर्जन डॉ. साहिल पाल अपने प्रशासनिक आदेशों और दवा खरीद से जुड़े टेंडर अनियमित को लेकर हाल के दिनों में लगातार चर्चा में रहे हैं. कुछ मामलों की जांच भी चल रही है. ऐसे में दो-दो उपाधीक्षकों और पूर्णकालिक हॉस्पिटल मैनेजर की मौजूदगी के बावजूद एक सप्लायर से जुड़े कंप्यूटर सहायक को बड़ी प्रशासनिक जिम्मेदारी सौंपे जाने से अस्पताल के भीतर वित्तीय पारदर्शिता और सिविल सर्जन डॉ. साहिर पाल की कार्यशैली पर सवाल उठने लगे है.
प्रशासनिक हलकों में चर्चा है कि नियमों के विपरीत जाकर आरसीएच कार्यालय के कंप्यूटर सहायक विमल कुमार मंडल को सदर अस्पताल के फैब्रिकेटेड वार्ड का हॉस्पिटल मैनेजर बना दिया गया है, जबकि उनका मूल काम केवल रूटीन इम्युनाइजेशन (RI) के डाटा का संधारण करना है. इस मामले में वित्तीय अनियमितता के गंभीर आरोप लग रहे हैं.
दरअसल, उनकी पत्नी माधवी मंडल भी सदर अस्पताल के डीईआईसी सेंटर में एएनएम के रूप में सेवारत हैं. आरोप है कि विमल कुमार ने सरकारी नियमों की अनदेखी कर अपनी पत्नी के नाम पर एक सप्लायर कंपनी बनाई है.
यह कंपनी सिविल सर्जन कार्यालय, एसीएमओ ऑफिस, सदर अस्पताल सहित पूर्वी सिंहभूम के सभी सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों (CHCs) में सामानों की सप्लाई करती है. एक ही विभाग में पति-पत्नी के रसूख और इस तरह के व्यावसायिक जुड़ाव ने अब पूरी व्यवस्था को गंभीर सवालों के घेरे में ला खड़ा किया है.
जबकि, The Jharkhand Government Servants’ Conduct Rules, 1976 के नियम 16 के तहत कोई भी सरकारी कर्मचारी सरकार की पूर्व अनुमति के बिना प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से किसी भी प्रकार के निजी व्यापार, व्यवसाय या व्यावसायिक ठेकेदारी में शामिल नहीं हो सकता. यह नियम अनुबंध पर कार्य कर रहे कर्मचारियों पर भी लागू होता है.
अगर कर्मचारी खुद सामान की जरूरत तय कर रहा है और पत्नी की कंपनी उस सामान की आपूर्ति कर रही है, तो यह कानूनन वित्तीय कदाचार और शक्तियों का दुरुपयोग माना जाता है. ऐसे मामले में नियमों के उल्लंघन के आरोप में जांच कराकर तत्काल पहले निलंबित करने का प्रावधान है.
पद का दुरुपयोग कर अवैध रूप से धन अर्जित करने के मामले में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत एफआईआर दर्ज करने से लेकर गंभीर वित्तीय अनियमितता साबित होने पर सरकारी नौकरी से बर्खास्ती तक संभव है. इस मामले में सिविल सर्जन का पक्ष नहीं मिल सका है, उनकी प्रतिक्रिया आते ही खबर में शामिल की जायेगी.

