Giridih : लंगटा बाबा के समाधी स्थल पर उमड़ा आस्था का जनसैलाब

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  • जमुआ थाना प्रभारी ने की पहली चादरपोशी

फतेह लाइव, रिपोर्टर

लंगटा बाबा के समाधि पर्व पर जमुआ के खरगडीहा स्थित बाबा के समाधि पर आस्था का जनसैलाब उमड़ा. इस मौके पर हमेशा की तरह सोमवार अहले सुबह जमुआ थाना के थाना प्रभारी द्वारा बाबा की समाधि पर पूरी शिद्दत और आस्था के साथ पहली चादर पोशी की गई. इसके बाद बाबा के समाधि पर आम श्रद्धालुओं ने चादरपोशी की. गौरतलब है कि पौष पूर्णिमा के मौके पर हर वर्ष बाबा का समाधि पर्व मनाया जाता है. जिसमें आस्था का जन सैलाब उमड़ता है. यहां सभी जाति धर्म के लोग चादरपोशी करने पहुंचते हैं. न केवल गिरिडीह जिले के विभिन्न प्रखंडों के लोग बल्कि पूरे झारखण्ड प्रदेश के अलावे विभिन्न प्रदेशों के श्रद्धालु यहां पहुंच चादरपोशी करते हैं. बताया जाता है कि कि 1870 में देवघर जाने के क्रम में नागा साधुओं का एक दल विश्राम के लिए खरगडीहा थाना परिसर में रुका था. शेष साधु दूसरे दिन अपने गंतव्य की ओर रवाना हो गए पर एक साधु नग्न धड़ंग अवस्था में थाना परिसर में ही धुनी रमाये बैठे रहे. कालांतर में यही साधु लंगटा बाबा के रूप में विख्यात हुए.

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उस जमाने में खरगडीहा में अंग्रेज पुलिस का थाना था और परगना कार्यालय था. यहां अंग्रेज अधिकारियों का आना जाना लगा रहता था. एक बार एक अंग्रेज अधिकारी ने बाबा को थाना से अन्यत्र जाने का फरमान सुना दिया. तब बाबा ने उस अंग्रेज अधिकारी से कहा कि जा महाराज आकाश निर्मल है. जब वह अंग्रेज अधिकारी वापस लौट रहा था तो उसे रास्ते में अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा. अंग्रेज अधिकारी लौट कर खरगडीहा आया और बाबा से माफी मांगी. जानकारों की माने तो खरगडीहा प्रवास के दौरान बाबा ने अनेक लीलाएं की और पीड़ितों के कष्टों का निवारण भी किया. बाबा वर्ष 1910 के पुष पूर्णिमा को देह त्याग कर महासमाधि में प्रवेश कर गये. तब से प्रत्येक वर्ष पौष पूर्णिमा के मौके पर बाबा के समाधि पर चादरपोशी के लिए न केवल झारखण्ड और बिहार प्रदेश के अपितु अन्य प्रान्तों के भक्तों का खरगडीहा में सैलाब उमड़ता है.

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बाबा के समाधि पर पहला चादरपोशी जमुआ के थानेदार द्वारा किया जाता है. वहीं पहले पहर हिन्दू और दूसरे पहर मुस्लिम धर्मावलंबियों द्वारा चादर पोशी की जाती है. कहते हैं कि पीड़ित मानवता के उद्धारक संत जगतगुरु वामदेव, लंगेश्वरी बाबा उर्फ लंगटा बाबा थे. बाबा के भक्तों में अमीर, गरीब, ऊंच-नीच, हिन्दू मुसलमान, सिख सभी शामिल थे. बाबा अपने सभी भक्तों को एक समान मानते थे. बाबा अपने अमीर भक्तों की खीर पुड़ी को सामने के कुएं में यह कहकर डलवा देते थे कि ठंबी करो महाराज, वहीं गरीब की सत्तु को बड़े चाव से ग्रहण कर लेते थे. यही वजह है कि बाबा के समाधि पर सभी धर्म और वर्ग के भक्त मत्था टेकते हैं. चादरपोशी करते हैं और मन्नतें मांगते हैं. बताया जाता है कि पीड़ितों और फरियादियों के लिए बाबा हमेशा एक उच्च कोटि के संत और साधक की भूमिका अदा करते थे. उनके सानिध्य में जाते ही भक्तों की सभी समस्याएं दूर हो जाती थी.

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