प्रीतम भाटिया की कलम से. 

हिंदी पत्रकारिता दिवस हर साल 30 मई को मनाया जाता है.भारतीय पत्रकारिता के इतिहास में यह एक बहुत ही बड़ा और महत्वपूर्ण दिन है.30 मई 1826 को भारत का पहला हिंदी साप्ताहिक समाचार पत्र *’उदन्त मार्तण्ड*’ (जिसका अर्थ है *’उगता हुआ सूर्य’*) बंगाल की क्रांतिकारी धरती के कोलकाता से प्रकाशित हुआ था जिसके संपादक पंडित जुगल किशोर शुक्ल थे.

इस दिन को मनाने का मुख्य उद्देश्य समाज में हिंदी पत्रकारिता के महत्व को रेखांकित करना और निष्पक्ष व निर्भीक पत्रकारिता को बढ़ावा देना भी है.

आज इस क्रांतिकारी दिवस पर देश का हर बड़े से बड़ा नेता,अधिकारी, समाजसेवी और सारे पत्रकार सिर्फ़ शुभकामनाएं भर देकर अपनी जिम्मेदारी पूरी कर ले रहा है जबकि विश्व में पत्रकारों की सुरक्षा और स्वतंत्रता के सूचकांक में हम जहां खड़े हैं वो बहुत ही शर्मनाक और हास्यास्पद है,वो भी ऐसे समय में जब भारत विश्वगुरु बनने की कल्पना कर रहा हो.

1947 में देश आजाद हुआ और 1950 में नया संविधान बना फिर सरकार की कलम से कालान्तर में नए-नए कानून भी बनते चले गए जिसमें क्रांतिकारी योगदान देश के समर्पित पत्रकारों का ही रहा है. लेकिन कभी किसी ने भी सोचा है कि पत्रकार आज कहा खड़े हैं और इसके लिए जिम्मेदार कौन हैं.पत्रकारों की हत्याओं,गंभीर हमले,कलम के सिपाहियों के मनोबल को तोड़ने के लिए विभिन्न राज्यों में दर्ज हो रहे फर्जी मामलो की लंबी फेहरिस्त और उस पर सत्ता और विपक्ष के साथ हर भारतीय का चुप रहना.

उस पर भी सारे बड़े चैनल,अखबार और न्यूज पोर्टल का इस अति गंभीर मुद्दे पर कभी भी मुखर हाेकर कोई अभियान न चलाना और वो भी सिर्फ इसीलिए कि उन्हें सरकारी विज्ञापन और सस्ते शोषित मजदूर के रुप में काम करने के लिए पत्रकार मिलते रहें.क्या आजादी का अमृत महोत्सव मना रहे इस देश को अब भी ऐसा लग रहा है कि पत्रकार और पत्रकारिता सुरक्षित हैं.क्या आपको कभी भी ऐसा नहीं लगता कि हमारे देश की उजड़ती हुई इस असुक्षित पत्रकारिता को फिर से एक मार्तण्ड की तलाश है?अगर लगता है तो फिर चुप मत बैठो.

लेखक. (सम्पादक-झारखंड ऑब्जर्वर एवं राष्ट्रीय महासचिव,ऑल इंडिया स्मॉल एंड मीडियम जर्नलिस्ट वेलफेयर एसोसिएशन,नई दिल्ली.)

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