- आयुष चिकित्सक के भरोसे चल रहा है आईसीयू और फैब्रिकेटेड वार्ड, प्रबंधन संभाल रहा कंप्यूटर ऑपरेटर
- मरीजों को नहीं मिल रहा मुकम्मल इलाज , अब यहां खोला गया एचडीयू , सिविल सर्जन ने किया उद्घाटन
- टेक्नीशियन और डॉक्टर के नहीं रहने के कारण बंद हो गया डायलिसिस वार्ड, आईसीयू तक में डॉक्टर नहीं
- स्वास्थ्य मंत्री करें हस्तक्षेप, पूरी व्यवस्था हो रही है चौपट, बड़े बदलाव की जरूरत महसूस कर रहा अस्पताल
फतेह लाइव, रिपोर्टर.
जमशेदपुर सदर अस्पताल के फेब्रिकेटेड वार्ड में इलाज नहीं मिलने के कारण रविवार की रात महिला मरीज आशिता नंदी की मौत ने स्वास्थ्य सेवा और व्यवस्था पर सवालिया निशान लगा दिया है. मरीज की मौत के बाद परिजनों ने हंगामा किया, और व्यवस्था पर कई सवाल उठा दिये. कहा कि जब इलाज की सुविधा नहीं थी तो मरीज को फेब्रिकेटेड वार्ड में क्यों भेजा गया? यहां रात के समय आयुष चिकित्सा पदाधिकारी डॉ राजेश की ड्यूटी थी, तो वह कहां गायब थे? परिजनों का आरोप था कि इलाज के अभाव में महिला मरीज आशिता नंदी की मौत हो गई है. यही नहीं छह जून की रात इमरजेंसी में आये मरीजों ने डॉक्टर के गायब रहने पर जमकर हंगामा किया था. उस समय डॉ अभिषेक की ड्यूटी थी, जो वहां नहीं थे.
उधर, महिला मरीज की मौत सदर अस्पताल के उस फेब्रिकेटेड वार्ड में हुई है, जहां सिविल सर्जन डॉ साहिर पाल ने अपने एक चहेते कंप्यूटर सहायक विमल कुमार मंडल को पूरी व्यवस्था की ऑपरेशनल जिम्मेदारी बतौर (हॉस्पीटल मैनेजर) सौंप दी है. न तो पर्याप्त अनुभव, न ही योग्यता, अब मरीज की मौत के बाद फेब्रिकेटेड वार्ड की पूरी व्यवस्था ही सवालों के घेरे में आ गयी है. सवाल यह उठाया जा रहा है कि आखिर रात की पाली में ऑन ड्यूटी डॉक्टर कहां थे? ड्यूटी का प्रबंधन कौन कर रहा था? अगर यह चूक हुई तो इसके लिए कौन लोग जिम्मेवार हैं? सिविल सर्जन ने अब तक इस मामले में क्या कार्रवाई की है ?
हालांकि जमशेदपुर सदर अस्पताल में मरीज की मौत नयी बात नहीं है. सूत्रों का यहां तक कहना है कि बीते एक सप्ताह में सही इलाज के अभाव में तीन मरीजों की यहां जान चली गयी, लेकिन सभी मामलों को सामान्य बताकर दबा दिया गया. अस्पताल की व्यवस्था बद से बदतर होती जा रही है. यहां ऑपरेशन थियेटर से लेकर दूसरे विभागों में सामान्य जरूरी दवाओं का अभाव है. डॉक्टरों को छोटे-छोटे उपकरण मास्क-हैंड गलब्स आदि नहीं मिल पा रहे हैं. हां, यह बात जरूर है कि सिविल सर्जन और उनकी टीम तबादला-पोस्टिंग और दवाओं की खरीद के लिए चहेती एजेंसियों को टेंडर देने की काफी तत्परता से काम रही है.
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बीते दिनों सदर अस्पताल में दवा खरीद में बड़ी गोलमाल की शिकायत भी सामने आयी, जिसकी जांच प्रशासन के स्तर पर चल रही है. हालांकि अस्पताल और सिविल सर्जन कार्यालय के कर्मचारी ही यह मानते है कि इस जांच का परिणाम कुछ भी सामने नहीं आने वाला है, क्योंकि टेंडर में अहम भूमिका निभाने वाले सिविल सर्जन को ही जांच कमेटी में शामिल कर लिया गया. ऐसे में प्रशासन की मंशा भी स्पष्ट हो चुकी है कि यह जांच ठंडे बस्ते में डाली जाने वाली है. कहा तो यहां तक जा रहा है वर्तमान सिविल सर्जन को सिर्फ स्वास्थ्य मंत्री की नजदीकी का फायदा मिल रहा है, वरना स्वास्थ्य सेवाओं की ऐसी स्थिति बीते 15 साल में कभी नहीं हुई थी.
जानकारों की मानें तो सदर अस्पताल का आईसीयू और फैब्रिकेटेड वार्ड आयुष चिकित्सक के भरोसे चल रहा है और डॉक्टर की लापरवाही से मरीज की मौत हो रही है, लेकिन इसे देखने वाला कोई नहीं है. सदर अस्पताल का डायलिसिस वार्ड, डायलिसिस टेक्नीशियन और डॉक्टर के नहीं रहने के कारण बंद हो गये हैं. आईसीयू में भी डॉक्टर नहीं हैं, सिविल सर्जन ने बीते दिनों नया वार्ड एचडीयू का उद्घाटन भी कर दिया है. इसका संचालन कब तक होगा यह देखने वाली बात होगी. हां यह बात जरूर है कि डॉक्टर और कर्मचारियों की पूरी टीम का पूरा फोकस आयुष्मान का पैसा लेने पर जाकर ठहर गया है.
DPC के अनुभव प्रमाणपत्र पर फंसा पेंच, नहीं मिला वेतन, तो क्या नियुक्ति अवैध !
जमशेदपुर के स्वास्थ्य विभाग में कितना बड़ा गड़बड़झाला चल रहा है इसका नायाब उदाहरण DPC (District Programme Cordinator) की नियुक्ति को लेकर सामने आया है. कहा तो यहां तक जा रहा है कि पूरी की पूरी नियुक्ति प्रक्रिया में ही गोलमाल है, लेकिन बड़ा पेंच DPC के रूप में चयनित डॉ अंकित कुमार के अनुभव प्रमाणपत्र पर जाकर उलझ गया है.
यह बहाली झारखंड स्टेट आरोग्य सोसाईटी के अंतर्गत दिसंबर 2025 में की गयी थी. नियुक्ति प्रक्रिया में दिया गया अनुभव प्रमाणपत्र को जारी करने वाली कंपनी ने 23 दिसंबर 2025 में एक मेल भेजकर ‘फेक’ करार दिया था. बावजूद 8 जनवरी 2026 को सिविल सर्जन ने चयन को अंतिम रूप देते हुए डॉ अंकित कुमार को योगदान करने का पत्र जारी कर दिया. इस मामले में नियुक्ति की प्रक्रिया में तब सवाल उठ खड़ा हुआ जब सिविल सर्जन ने चयनित DPC के लिए झारखंड स्टेट आरोग्य सोसाईटी से वेतन मद में राशि की मांग की. सोसाईटी की ओर से चयनित उम्मीदवार के अनुभव प्रमाणपत्र पर सवाल उठाये गये और सिविल सर्जन से स्पष्टीकरण मांगा गया.
इसमें 24 अप्रैल 2026 को सिविल सर्जन ने तमाम दस्तावेताओं की सही करार देते हुए वेतन जारी करने का अनुरोध किया, हालांकि सोसाईटी की ओर से अब तक इस मामले में पहल नहीं गयी. इस बीच फरवरी से बिना वेतन कार्य कर रहे DPC डॉ अंकित कुमार ने अचानक कार्यालय आना छोड़ दिया. सूत्रों की माने तो वेतन नहीं मिल पाने से यह स्थिति उत्पन्न हुई है. यहां हेल्थ एडवाइजर की हुई बहाली में भी बड़ा पेंच फंसा हुआ है. क्रमश : ….
हमारा प्रयास है कि सच जिला प्रशासन और सरकार के सामने आये. ऐसे में किसी को अपना पक्ष रखना है तो whatsapp 9234051616 पर भेज सकते हैं, पूरे सम्मान के साथ उसका संज्ञान लिया जायेगा.

