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Jamshedpur Sadar Hospital : सिविल सर्जन के हर औचक निरीक्षण में दिखता है यह लैब टेक्नीशियन, क्या है इसकी भूमिका!

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फतेह लाइव रिपोर्टर।

पूर्वी सिंहभूम जिले की स्वास्थ्य व्यवस्था इन दिनों एक ऐसे अनोखे ‘चमत्कार’ की गवाह बन रही है, जिसकी चर्चा हर तरफ हो रही है. एक तरफ जहां सिविल सर्जन डॉ. साहिर पाल के औचक निरीक्षणों का मकसद अस्पतालों की बदहाली और गायब डॉक्टरों पर शिकंजा कसना होता है, वहीं दूसरी तरफ इस पूरे ‘मिशन’ की सफलता को लेकर गलियारों में तरह-तरह की चर्चाएं हैं.

आखिर जिले के हर छोटे-बड़े दौरे में पटमदा के एक खास लैब टेक्नीशियन की अनिवार्य मौजूदगी क्या बयान करती है? आइए जानते हैं, इस रिपोर्ट में कि कागजों पर एक जगह और मैदानी दौरों में साया बनकर रहने वाले इस ‘सुपर-टेक्नीशियन’ की असली भूमिका क्या है.

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साहब के दौरे में क्यों नजर आते हैं यह ‘खास’ टेक्नीशियन?

आम तौर पर लैब टेक्नीशियन का काम पैथोलॉजी लैब में बैठकर मरीजों की जांच करना होता है, लेकिन हमारे इन ‘सुपर-टेक्नीशियन’ महोदय की कार्यकुशलता का दायरा बहुत बड़ा है. पटमदा में कागजों पर पोस्टेड होने के बावजूद वह अपना ज्यादातर समय सिविल सर्जन कार्यालय या साहब के काफिले की शोभा बढ़ाने में बिताते हैं.

विभाग के गलियारों में अब यह सवाल मजाक-मजाक में ही सही, लेकिन जोर-शोर से पूछा जाने लगा है कि आखिर इस ‘लकी लैब टेक्नीशियन’ में ऐसी कौन सी खूबी है कि घाटशिला और बहरागोड़ा से लेकर हर छोटे-बड़े निरीक्षण में उनकी मौजूदगी अनिवार्य हो जाती है? क्या बिना इनकी मौजूदगी के साहब का कोई भी निरीक्षण पूरा नहीं हो सकता, या फिर तकनीकी ज्ञान के अलावा इस ‘विशेष सेवा’ का कोई और ही सीक्रेट है ?

औचक निरीक्षण या सिर्फ कागजी खानापूर्ति?

हाल ही में घाटशिला और बहरागोड़ा के अस्पतालों में हुए औचक निरीक्षण के दौरान कई चिकित्सक और स्वास्थ्यकर्मी अपनी ड्यूटी से नदारद मिले थे, जिसके बाद सिविल सर्जन कार्यालय की ओर से ताबड़तोड़ शोकॉज (स्पष्टीकरण) जारी किए गए। पहली नजर में यह कार्रवाई भले ही स्वास्थ्य व्यवस्था को दुरुस्त करने की एक कड़ी पहल लगती हो, लेकिन मैदानी हकीकत इसके बिल्कुल उलट और शून्य साबित हो रही है।

महकमे के भीतर सुगबुगाहट इस बात की है कि निरीक्षण के ठीक तुरंत बाद, उन लापरवाह कर्मियों से ‘डैमेज कंट्रोल’ करने और पर्दे के पीछे से मामले को रफा-दफा करने का अनधिकृत जिम्मा इसी ‘चहेते’ लैब टेक्नीशियन के कंधों पर होता है। यही मुख्य वजह है कि आज तक किसी भी मामले में स्पष्टीकरण के नोटिस से आगे की कार्रवाई कभी बढ़ ही नहीं पाई, और न ही किसी दोषी पर ठोस अनुशासनात्मक कार्रवाई का एक भी उदाहरण सामने आया है।

अब इसे प्रशासनिक लाचारी कहें या सुनियोजित ‘सेटिंग’ का खेल; आम जनता और महकमे के ईमानदार कर्मचारी यह सोचने पर मजबूर हैं कि जिले की चरमराती स्वास्थ्य व्यवस्था को सुधारने के नाम पर चलाया जा रहा यह अभियान वास्तव में मरीजों की बेहतरी के लिए है, या फिर यह सिर्फ एक सुनियोजित और बेहतरीन ढंग से निर्देशित नाटक बनकर रह गया है?

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