सिखों के पांचवें गुरु का 420वां शहीदी दिहाड़ा 18 जून को, लौहनगरी के सिख आस्था और सेवा भाव में हुए लीन
गुरुद्वारों में सजेंगे विशेष दिवान, सीजीपीसी प्रधान ने कोल्हान की संगत को “फतेह लाइव” के माध्यम से दिया संदेश…
रविवार को सिख संगत ने जगह-जगह शबील लगाकर राहगीरों को पहुंचाई राहत
विशेष – टाटा टिनप्लेट डिवीजन के सिख कर्मचारी 70 साल से निभा रहे दायित्व
स्थानीय संपादक, गुरमीत कौर की कलम से.
सिखों के पांचवे गुरु, जिन्हें शहीदों के सरताज और शांति के पूंज कहा जाता है. श्री गुरु अर्जुन देव जी महाराज को मुगल बादशाह जहांगीर ने 1606 को लाहौर में शहीद कर दिया गया था. शहीदी के समय मिंया मीर ने गुरु अर्जुन देव जी से पूछा कि आपके शरीर पर छाले पड़ रहे हैं. इसके बावजूद आप शांत हैं. तब गुरु अर्जुन देव ने कहा था कि जितने जिस्म पर पड़ेंगे छाले, उतने सिख होंगे सिदक वाले. यानी मेरे शरीर में जितने छाले पड़ेंगे, उतरे हजारो-करोड़ों सदके वाले सिखों का जन्म होगा.
कोल्हान के सिखों के की सर्वोच्च धार्मिक संस्था सेंट्रल गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के प्रधान भगवान सिंह ने “फतेह लाइव” से विशेष बातचीत के दौरान संगत के लिए एक संदेश छोड़ा. उन्होंने गुरु के शहीदी दिवस को मीठे पानी वाला गुरुपर्व नहीं बल्कि शहादत के रूप में स्मरण करने का संकल्प लेने वाला पर्व बताया. इनका कहना है कि हर सिख को उनकी शहीदी से प्रेरणा लेनी चाहिए. उनकी शहादत को अपने जहन में रखना चाहिए. उनका इतिहास पढ़ना चाहिए ताकि जीवन में आने वाली किसी भी विषम परिस्थिति में अपने मार्ग से डगमगाएंगे नहीं.
गुरु जी को गर्म तवे पर बैठाकर उन पर गर्म रेत डाला जाता रहा. इसके बावजूद वे शांत रहे. उनका शरीर तप रहा था लेकिन उनका मन अकाल पुरख से जुड़ा हुआ था. हमें भी उनकी तरह ही अडोल रहना चाहिए. उनकी शहादत को लासानी (अनोखी) शहादत कहा जाता है. सिख इतिहास में गुरु अर्जुन देव पहले सिख गुरु हुए. उनकी याद में ही शबील लगाई जाती है, जो जून की गर्मी में मानवता के नाते लोगों को शीतलता प्रदान करने की एक पहल है. भगवान सिंह ने सभी सिखों से अपील की है कि वे गुरु साहिब के इतिहास को जरूर पढ़े. यही असल में शहीदी गुरु पर्व मानाना होगा.
नाना से मिली थी गुरमत की शिक्षा
गुरु अर्जुन देव जी का जन्म दो मई 1563 में पंजाब के गोइंदवाल में गुरु राम दास व माता भानी जी के घर पर हुआ था. उन्हें गुरमत की शिक्षा वर्ष 1581 में अपने नाना गुरु अमर दास जी से मिली, जो सिखों के तीसरे गुरु थे. इसके बाद गुरु जी ने अपने जीवन काल में बहुत सारे काम किए. इसमें गरीबाें की सेवा के लिए गुरुद्वारों में दवाखाने खुलवाने, गुरु घर की गोलक (दान पेटी) का उपयोग परोपकार में खर्च करने में लगाए. वर्ष 1597 में जब लाहौर में अकाल पड़ा, कई लोग बीमार हुए तो गुरु जी ने अपने हाथों से लोगों की सेवा की. साथ ही लाहौर से वापस आते समय उन्होंने सिखी धर्म का प्रचार-प्रसार किया। उनकी पहल पर ही वर्ष 1601 में लोगों को एक अकाल पुरख से जोड़ा गया. आद ग्रंथ साहिब की लिखाई भी इन्होंने ही शुरू कराई थी जिसकी जिम्मेदारी भाई गुरुदास जी को सौपी गई थी.
गुरु अर्जुन देव जी का शहीदी दिवस सिख धर्म के पाँचवें गुरु, श्री गुरु अर्जुन देव जी की महान शहादत की स्मृति में प्रतिवर्ष सिख पंचांग के अनुसार जेठ महीने (मई/जून) में मनाया जाता है. यह दिवस उनके अदम्य साहस और धर्म की रक्षा के लिए उनके सर्वोच्च बलिदान को समर्पित है.
गुरु अर्जुन देव जी (15 अप्रैल 1563 – 30 मई 1606) सिख धर्म के पांचवें गुरु और मानवता के सच्चे प्रतीक थे. उन्हें सही मायने में ‘शांति के पुंज’ और ‘शहीदों के सरताज’ कहा जाता है, क्योंकि उन्होंने जीवनभर सहनशीलता, परोपकार और धार्मिक सद्भाव का संदेश दिया.
गुरु अर्जुन देव जी के जीवन और शिक्षाओं के कुछ प्रमुख पहलू एक नजर में श्रवण करें
श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी का संकलन : उनका सबसे महान योगदान सिख धर्म के पवित्र ग्रंथ ‘आदि ग्रंथ’ (जिसे बाद में गुरु ग्रंथ साहिब कहा गया) का संपादन करना था, जिसे 1604 में भाई गुरदास जी की सहायता से पूरा किया गया. इसमें उन्होंने सभी धर्मों के संतों की वाणियों को शामिल करके सर्वधर्म समभाव का अनूठा उदाहरण पेश किया.
हरिमंदिर साहिब की नींव: अमृतसर में ‘श्री हरिमंदिर साहिब’ (स्वर्ण मंदिर) का निर्माण उन्होंने ही करवाया था. इसकी नींव एक प्रसिद्ध सूफी संत मियां मीर जी से रखवाई गई थी, जो उनकी सर्व-धर्म सद्भाव की भावना को दर्शाता है.
सामाजिक कार्य व समानता : उन्होंने समाज कल्याण के लिए कई नगर बसाए (जैसे तरनतारन साहिब और करतारपुर) और कुएं-बावड़ियां बनवाईं. उन्होंने ‘दसवंध’ (आय का दसवां हिस्सा दान करना) की प्रथा शुरू की.
अदभुत बलिदान (शहादत): मुगल सम्राट जहांगीर के अत्याचारों के सामने उन्होंने अपने सिद्धांतों से कभी समझौता नहीं किया. उन्होंने बिना किसी शिकायत के उबलते गर्म तवे पर बैठकर और अपने शरीर पर गर्म रेत डलवाकर सर्वोच्च बलिदान दिया, लेकिन ‘तेरा कीआ मीठा लागे’ (प्रभु का हर भाणा मीठा लगे) का जाप करते रहे.
शहादत का संक्षिप्त विवरण :
ऐतिहासिक तिथि : मुगल बादशाह जहांगीर के आदेश पर 1606 में उन्हें लाहौर में शहीद किया गया था.
कारण : गुरु साहिब द्वारा ‘आदि ग्रंथ’ (श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी) का संकलन और उनके बढ़ते आध्यात्मिक प्रभाव से भयभीत होकर जहांगीर ने उन्हें इस्लाम धर्म अपनाने का दबाव डाला था. गुरु जी ने इस आदेश को अस्वीकार कर दिया.
अत्याचार : उन्हें अत्यधिक यातनाएं दी गईं. तपती धूप में बैठाकर उनके शरीर पर उबलती हुई रेत और गर्म पानी डाला गया. इसके बाद वे रावी नदी में ज्योति-जोत समा गए.
इस दिन का महत्व : यह दिन सिख इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ माना जाता है, जिसने शांतिप्रिय सिख समुदाय को अन्याय के खिलाफ लड़ने के लिए प्रेरित किया. इस अवसर पर दुनियाभर के गुरुद्वारों में विशेष प्रार्थनाएं और कीर्तन दीवान सजाए जाते हैं. गर्मी के भीषण मौसम को देखते हुए आम जनता और राहगीरों को ठंडे पानी की शबीलें (मीठे पानी और चना की निःशुल्क सेवा) पिलाई जाती है.
मिनी पंजाब कहलाने वाली लौहनगरी के सिख भी कर रहे जप-तप
[गुरु महाराज का 420वां शहीदी दिहाड़ा आगामी 18 जून गुरुवार को मिनी पंजाब कही जाने वाली लौहनगरी में श्रद्धाभाव से मनाया जायेगा. कोल्हान में बसे सिख, खासकर 34 गुरुद्वारों में विशेष सेवा भावना देखने को मिल रही है. यह दौर पिछले 40 दिनों से जारी है. मान्यता अनुसार शहीदी दिवस को लेकर 40 दिन पहले गुरुद्वारों में श्री सुखमणि साहेब के पाठ किये जाते हैं. महिलाएं, बच्चे इसे लेकर धार्मिक मर्यादा में रहते हुए गुरु घर के कार्यों की सेवा संभाल करते हैं. 18 जून को इस दिवस पर सभी गुरुद्वारों में संगत को गुरु घर से जोड़ने के लिए कमेटियां विशेष योगदान निभा रही हैं.
हर रोज शहर में लगाई जा रही शबीलें, मानवता का संदेश दे रहा समाज
इस दिन को लेकर सिख समुदाय 40 दिनों से गर्मी में राहगीरों की सेवा शबील लगाकर कर रहे हैं और मानवता की सेवा कर रहे हैं. ऐसा नहीं कि अगर गर्मी ऐसे ही तड़पाये तो पर्व के बाद सेवा का यह दौर समाप्त हो जायेगा. उसके बाद भी सिख अपनी जिम्मेदारियां निभाते देखे जा सकते हैं. खैर, यह सेवा भाव का एक इतिहास जमशेदपुर में तब देखने को मिला जब करीब 70 सालों से चल रही शबील सेवा के बारे जानकारी प्राप्त हुई. टिनप्लेट कंपनी अभी (टाटा डिवीजन) के सिख कर्मचारी भी अपने गुरुओं की शिक्षा पर चलते हुए इस सेवा को आगे बड़ा रहे हैं.
टिनप्लेट कंपनी के सिख कर्मी 70 सालों से लगा रहे शबील
टाटा टिनप्लेट डिवीजन के सिख कर्मचारी पिछले 70 सालों से सीआरएम गेट के सामने छबील लगाकर सेवा भावना की मिसाल कायम कर रहे हैं. रविवार को भी सिख कर्मचारी भाई मानक सिंह की अरदास बाद शरबत व चना (प्रसाद रूपी) का वितरण करके गुरूजी को याद किया गया. इस आयोजन में कंपनी के चीफ वर्कर्स एसजे डे, यूनियन अध्यक्ष राकेश्वर पांडे, डिप्टी प्रेसिडेंट परविंदर सिंह सोहल, महामंत्री मनोज कुमार, सीजीपीसी की टीम और अन्य कर्मचारियों ने शामिल होकर सेवा की.
साकची में रामदास सेवक जत्था ने शबील के साथ लगाया मेडिकल कैंप
साकची झंडा चौक में श्री गुरु रामदास सेवक जत्था द्वारा संगत के सहयोग से शबील के आयोजन के साथ मेडिकल कैंप लगाया गया. इसकी शुरुआत सीजीपीसी द्वारा संचालित श्री गुरु रामदास भलाई केंद्र ओपीडी में एक वर्ष से निशुल्क सेवाएं दे रहे डॉक्टर अमरजीत सिंह, डा. हरप्रीत सिंह, डा. इंद्रजीत मुखर्जी, डा. प्रवीना मुखर्जी, डा. राजदीप कौर, डा. केपीके साहू, डा. सतबीर सिंह, डा. सिमरन पाल सिंह के कर कमलो से की गई. इस मौके पर विशेष रूप से सीजीपीसी टीम भी रही. कार्यक्रम की विशेषता यह रही की मेडिकल कैंप के समापन पर सभी सीजीपीसी कार्यालय में एक वर्ष पूर्व से निशुल्क सेवाएं दे रहे सभी डॉक्टरो को गुरु अर्जुन देव जी की स्मृति में बनाया गया स्मृति चिन्ह भी प्रदान किया गया.
गोलपहाड़ी मोड़ में गुरुद्वारा कमेटी ने निभाई सेवा
गोलपहाड़ी खासमहल मोड़ में गुरुद्वारा कमेटी ने शबील लगाकर सेवा निभाई गई एवं चना का प्रसाद बाटा गया. इस दौरान सीजीपीसी के प्रधान भगवान सिंह टीम के साथ पहुंचे. स्थानीय गुरुद्वारा कमेटी के प्रधान लखविंदर सिंह, सरजामदा गुरुद्वारा के प्रधान रविंद्र सिंह, चरणजीत सिंह बंटी, सविंदर सिंह, जसपाल सिंह, बलविंदर सिंह, नौजवान सभा प्रधान तरनदीप सिंह, स्त्री सत्संग सभा प्रधान परमजीत कौर, तृप्ता कौर, ग्रंथी गुरमीत कौर आदि लोग शामिल हुए.
सोनारी में भी पिंकी परिवार ने राहगीरों को पहुंचाई राहत
सोनारी कागल नगर स्टेट बैंक बिल्डिंग में परमदीप सिंह पिंकी परिवार की ओर से मीठे शरबत की शबील लगाई गई. इस दौरान मीठे शरबत की शबील लगाई गई एवं काला चना का प्रसाद बांटा गया. इस मौके पर विशेष रूप से सीजीपीसी के प्रधान भगवान सिंह, चेयरमैन सरदार शैलेंद्र सिंह, सीनियर मीत प्रधान सुखविंदर सिंह राजू, सोनारी के प्रधान बलवीर सिंह, मनजीत सिंह, महासचिव गुरचरण सिंह बिल्ला, सुखदेव सिंह बिट्टू, सरबजीत सिंह ग्रेवाल, सुरेंद्र सिंह शिंदे, केंद्रीय नौजवान सभा के प्रधान अमरीक सिंह, जगतार सिंह नागी, विनोद प्रसाद, सुरजीत कुमार, अमरजीत सिंह, गुरजीत सिंह, सुनील नंदी आदि कई अन्य लोग शामिल थे.
सिख नौजवान सभा संत कुटिया ने की शबील में पहुंचे कई खास
इधर, शहीदी दिवस के मद्देनजर सिख नौजवान सभा संत कुटिया गुरुद्वारा ने संगत के सहयोग से मानगो गुरुनानक हॉस्पिटल के नजदीक शबील का आयोजन किया. इसमें मुख्य रूप से पूर्व सेंट्रल सिख नौजवान सभा के चेयरमैन दमनप्रीत सिंह, आग़ाज़ संस्था के संस्थापक अध्यक्ष इंद्रजीत सिंह, समाजसेविका प्रीति गुप्ता, झामुमो नेत्री चरणजीत भाटिया, सभा के मलविंदर सिंह, सतबीर सिंह, रोहित कुमार, सुशांत दुबे, लक्की सिंह, हंसराज सिंह, जसपाल सिंह, सरबजीत सिंह, कमलजीत सिंह, रणबीर सिंह, नमित कौरा, डॉली कौर, तंजीत कौर, सिमरन कौर, हरप्रीत कौर, दिलप्रीत कौर, गगनप्रीत कौर शामिल हुए.

