ज्योतिषाचार्य, पंडित राजेश पाठक की कलम से.
हिंदू धर्म में संकष्टी चतुर्थी व्रत का खासा मान है। अधिक मास के कृष्ण पक्ष में पड़ने वाली इस चतुर्थी को विभुवन संकष्टी चतुर्थी कहते हैं, जो हर तीन साल में एक बार आती है। विभुवन संकष्टी चतुर्थी के दिन भगवान गणेश की विधिपूर्वक पूजा करने से जीवन के संकट दूर होते हैं और सुख-समृद्धि का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
पाचांग के अनुसार ‘अधिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि 3 जून, बुधवार को रात 9 बजकर 22 मिनट पर शुरू होकर अगले दिन, 4 जून, गुरुवार को रात 11 बजकर 31 मिनट तक रहेगी। संकष्टी चतुर्थी व्रत में चंद्रमा को अर्घ्य देना अनिवार्य है और चंद्रोदय का मुहूर्त 3 जून को ही बन रहा है, इसलिए व्रत बुधवार को ही रखा जायेगा।
विभुवन संकष्टी चतुर्थी का महत्व
भगवान गणेश को विघ्नहर्ता और प्रथम पूज्य देव माना जाता है। इस व्रत को करने से कार्यों में आने वाली बाधाएं दूर होती हैं।धन, बुद्धि, सफलता और सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है।संतान, शिक्षा और कैरियर संबंधी समस्याओं में भी लाभ मिलने की मान्यता है। चंद्रमा को अर्घ्य देने और गणेश जी की पूजा करने से पापों का क्षय होता है।
क्या करें और क्या ना करें?
पूरे दिन श्रद्धा और संयम रखें। गणेश मंत्रों का जाप करें। जरूरतमंद लोगों को दान दें। चंद्र दर्शन के बाद ही व्रत खोलें। झूठ बोलने और क्रोध करने से बचें। तामसिक भोजन (मांस, मदिरा आदि) का सेवन न करें। किसी का अपमान या अनादर न करें।

