सरकारी सड़क पर कब्जा करके खुद हो रहे मालामाल, जिम्मेदार भी पी रहे घी

फतेह लाइव, रिपोर्टर.

दक्षिण पूर्व रेलवे के टाटानगर स्टेशन के बाहर खुलकर अतिक्रमण करने की इजाजत है. वह भी तब जब टाटानगर स्टेशन का विस्तार हो रहा है. इसमें करोड़ों करोड़ खर्च हो रहे हैं. यह जनता के पैसे हैं, लेकिन यह कहना गलत नहीं होगा कि इन रुपयों को बेहतर ढंग से लगाने का जिम्मा रेल के अधिकारियों के पास है. इस विस्तारीकरण योजना पर युद्ध स्तर में काम चल रहा है. दशकों पूर्व यहां टांगे चलते थे. अंडे बिकते थे. इस वक्त उस कहानी को दोहराना गलत होगा.

एक ओर अतिक्रमण हटाओ अभियान, दूसरी ओर…

धीरे धीरे जब स्टेशन का विस्तार हुआ और अतिक्रमण बढ़ता गया जो आज रेल के लिए एक कहावत बना हुआ है, जो हड्डी के नाम से विख्यात है. अब जब प्रधानमंत्री के विशेष उद्देश्य को लेकर स्टेशन में विस्तार का काम चल रहा है और अतिक्रमण हटाया जा रहा है. वह भी हड्डी के रूप में चर्चा का विषय बना हुआ है.

रेलवे बोर्ड, कोर्ट के आदेश की अवहेलना

इस समय स्टेशन क्षेत्र का जो हाल है वह रेल मंत्रालय, सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की धज्जियां उड़ाने वाला दिखाई दे रहा है. स्टेशन के बाहर रेल क्षेत्र को साफ सुथरा रखने का निर्देश बहुत पुराना है. अतिक्रमण होने पर थानेदार नपेंगे. यह न्यायलय का का सख्त आदेश है. पिछले समय टाटानगर स्टेशन साफ देखा गया. लंबे समय तक. लेकिन अब एक यादव जी का राज इन गेट में देखने लायक बनता है. उनके ठेले के सामने सरकारी रोड के बीचों बीच वाहनों की लंबी कतार आम जन के लिए मौत का सबब बन सकती है. वैसे यह यादव जी बहुत पुराने हैं. पहले इनका इलाका दूसरा था, लेकिन अब एन केन प्रकरण बदल चुका है.

सिंह जी पर भारी पड़ रहें यादव जी

यहां सिंह जी भी नहीं रहे. व्यवस्था बहाल होने पर यादव जी भी रहेंगे या नहीं यह बाद की बात है, लेकिन यह जाम प्रशासन के लिए सिरदर्द बनने वाला है. इसमें किसी सूत्र का हवाला देना भी गलत होगा कि स्थानीय किसी भी तरह का प्रशासन इन ठेला वालों के लिए गर्म है. बस कोई जिला या रेल प्रशासन का बड़ा अधिकारी आने पर सब कुछ ठेला कि तरह आगे बढ़ जाता है. वह पर्दा भी रेल और जिला प्रशासन का होता है, तांकि कोई उंगली उनपर ना उठे. बदनाम होते हैं बड़े अफसर, चाहे वह रेल के हो या जिला के. स्थानीय नेतागण केवल अपनी रोजी रोटी सेंकते हैं. दुर्घटना होने पर केवल बड़े लोग ही फंसते हैं. (जारी…)

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