आरपी पटेल हाई स्कूल मैदान के बजाय सार्वजनिक पार्क में फिर प्रशासन की नाक के नीचे सज रहीं दुकानें
पिछले साल के विरोध के बाद भी नहीं बदली तस्वीर; रेलवे को शिकायत, कार्रवाई के निर्देश की सूचना के सूचना के बीच प्रशासन की चुप्पी सवालों के घेरे में
फतेह लाइव, रिपोर्टर।
जमशेदपुर के जुगसलाई में दीपावली के नाम पर पटाखा कारोबार का खेल एक बार फिर सवालों के घेरे में है। पिछले साल की तरह इस बार भी आरपी पटेल हाई स्कूल मैदान के बजाय वीर कुंवर सिंह चौक स्थित टाटा पिगमेंट के सामने सार्वजनिक पार्क में पटाखा दुकानें सजाने की तैयारी प्रशासन को ठेंगा दिखाते हुए शुरू हो गई। ट्रकों के ट्रक पटाखें पहुंचने लगे हैं। टेंट बनना शुरू हो गया है। पार्क से सटकर गुजरने वाली हावड़ा-मुंबई रेल लाइन ने इस पूरे मामले को और संवेदनशील बना दिया है। ऐसे में सवाल सिर्फ पटाखा दुकानों की जगह का नहीं, बल्कि रेलवे सुरक्षा, सार्वजनिक संपत्ति, कथित अवैध वसूली और प्रशासनिक जवाबदेही का भी है।
क्या जुगसलाई नगर परिषद को जिला प्रशासन के आदेशों की परवाह नहीं? क्या जनप्रतिनिधियों के कथित संरक्षण और बिचौलियों के आर्थिक खेल के आगे सुरक्षा नियमों को नजरअंदाज किया जा रहा है? और यदि रेलवे लाइन के इतने करीब पटाखों का भंडारण या बिक्री होती है, तो किसी संभावित हादसे की जिम्मेदारी कौन लेगा?

फतेह लाइव ने पिछले वर्ष भी जुगसलाई पार्क में पटाखा दुकानें लगाने और इससे आम लोगों की सुरक्षा पर उठ रहे सवालों को प्रमुखता से प्रकाशित किया था। काफी विरोध और बवाल भी हुआ था। इसके बावजूद इस वर्ष फिर उसी स्थान पर दुकानें सजने की तैयारी की सूचना मिलना प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
स्कूल मैदान के नाम पर अनुमति, पार्क में दुकानें लगनी शुरू
प्राप्त जानकारी के अनुसार, जिला प्रशासन और धालभूम अनुमंडल प्रशासन की ओर से पटाखा बिक्री के लिए आरपी पटेल हाई स्कूल मैदान को निर्धारित किए जाने की बात कही जा रही है। लेकिन जुगसलाई में कथित तौर पर इस निर्धारित स्थान को दरकिनार कर घोड़ा चौक स्थित सार्वजनिक पार्क में दुकानें लगाई जाती हैं। इस साल भी प्रशासन की नाक के नीचे स्थानीय स्तर पर टेंट लगाने की गतिविधियां गुरुवार शाम से शुरू हो चुकी हैं। यदि यह स्थिति सही है, तो सवाल उठता है कि निर्धारित स्थल पर दुकानें लगाने के आदेश का पालन क्यों नहीं कराया जा रहा है?
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क्या नगर परिषद ने पार्क में पटाखा बाजार लगाने के लिए विधिवत अनुमति दी है? यदि अनुमति दी गई है, तो किस नियम और किस सुरक्षा आकलन के आधार पर? और यदि अनुमति नहीं है, तो टेंट लगाने की तैयारी पर अब तक रोक क्यों नहीं लगी?

पार्क से सटी हावड़ा-मुंबई रेल लाइन, सुरक्षा का सवाल सबसे गंभीर
जुगसलाई पार्क के ठीक बगल से हावड़ा-मुंबई रेल लाइन गुजरती है। यह कोई सामान्य स्थान नहीं, बल्कि देश के व्यस्त रेल मार्गों में शामिल महत्वपूर्ण रेलखंड है।

पटाखे विस्फोटक प्रकृति के होते हैं। ऐसे में रेल लाइन के निकट पटाखों की बिक्री, अस्थायी दुकानें, संभावित भंडारण और भीड़भाड़ को लेकर रेलवे सुरक्षा के मानकों की जांच आवश्यक है।
रेलवे से जुड़े नियमों के तहत रेल परिसर और रेल सुरक्षा से प्रभावित क्षेत्रों में ज्वलनशील एवं विस्फोटक पदार्थों की बिक्री, भंडारण या परिवहन पर लागू प्रतिबंधों और सुरक्षा शर्तों का पालन अनिवार्य है। हालांकि, पार्क की वास्तविक दूरी और वहां प्रस्तावित दुकानों की स्थिति के आधार पर संबंधित नियमों की पुष्टि रेलवे के सक्षम अधिकारियों को करनी होगी।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या रेलवे सुरक्षा विभाग ने इस स्थान का निरीक्षण किया है? क्या रेलवे की अनुमति या अनापत्ति आवश्यक है? और यदि रेल लाइन के निकट पटाखा बाजार लगाने की तैयारी है, तो रेलवे प्रशासन ने समय रहते हस्तक्षेप क्यों नहीं किया?
रेलवे को शिकायत, मंत्रालय से कार्रवाई के निर्देश की सूचना
इस मामले में रेलवे को भी शिकायत किए जाने की जानकारी सामने आई है। सूत्रों के अनुसार, शिकायत के बाद मंत्रालय की ओर से रेलवे पुलिस को कार्रवाई करने का निर्देश दिए जाने की सूचना है।
यदि यह जानकारी आधिकारिक रूप से पुष्ट होती है, तो रेलवे पुलिस और संबंधित विभागों की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है। अब देखना होगा कि रेलवे सुरक्षा बल मौके का निरीक्षण कर क्या कार्रवाई करती है और क्या पटाखा कारोबार से जुड़े संभावित सुरक्षा उल्लंघनों की जांच होती है।
रेलवे प्रशासन को यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि रेल लाइन के निकट पटाखों की दुकानें लगाने, विस्फोटक सामग्री के परिवहन और भंडारण को लेकर कौन-कौन से सुरक्षा मानक लागू होते हैं तथा उनका पालन सुनिश्चित करने के लिए क्या कदम उठाए गए हैं।
रिहायशी इलाके में पटाखों का स्टॉक, पिछले वर्षों में भी हो चुकी कार्रवाई
जुगसलाई में पटाखों के अवैध भंडारण और बिक्री को लेकर पहले भी प्रशासनिक कार्रवाई होती रही है। वर्ष 2020 में झारखंड हाई कोर्ट के निर्देशों के बाद जिला प्रशासन को घनी आबादी वाले क्षेत्रों में पटाखा कारोबार पर कार्रवाई करने का निर्देश दिया गया था।
नवंबर 2020 में जुगसलाई के घनी आबादी वाले क्षेत्र में पटाखा कारोबार को लेकर तत्कालीन धालभूम एसडीओ ने भी सुरक्षा संबंधी चिंता जताई थी। हाई कोर्ट ने जिला प्रशासन को घनी आबादी वाले क्षेत्रों में पटाखा दुकानें नहीं चलने देने और नियमों का उल्लंघन करने वाले लाइसेंसधारियों के खिलाफ कार्रवाई सुनिश्चित करने का निर्देश दिया था।
वर्ष 2023 में भी जुगसलाई में पटाखों के अवैध भंडारण और बिक्री के खिलाफ जिला प्रशासन ने छापेमारी की थी। उस दौरान तीन दुकानों को सील करने और भारी मात्रा में पटाखे जब्त करने की खबर सामने आई थी।
ऐसे में सवाल है कि जब पहले भी इस क्षेत्र में पटाखा कारोबार को लेकर कार्रवाई हो चुकी है, तो फिर हर साल वही स्थिति क्यों सामने आ रही है?
टेंट और जगह के नाम पर 40 हजार रुपये तक वसूली का आरोप
इस पूरे मामले में आर्थिक लेन-देन को लेकर भी गंभीर आरोप सामने आ रहे हैं। सूत्रों का दावा है कि पार्क में दुकान लगाने वाले पटाखा कारोबारियों से टेंट और जगह के नाम पर 40 हजार रुपये तक वसूले जा रहे हैं।
आरोप यह भी है कि इस रकम का एक सीमित हिस्सा ही सरकारी खजाने या नगर परिषद तक पहुंचता है, जबकि शेष राशि कथित तौर पर बिचौलियों के माध्यम से वसूली जा रही है। हालांकि, इस कथित वसूली की स्वतंत्र पुष्टि और संबंधित पक्षों का आधिकारिक पक्ष सामने आना अभी बाकी है।
यदि यह आरोप सही हैं, तो नगर परिषद को सार्वजनिक रूप से स्पष्ट करना चाहिए कि दुकान लगाने के लिए कितनी राशि निर्धारित की गई है, किस मद में वसूली हो रही है और प्रत्येक दुकानदार को कितनी राशि की आधिकारिक रसीद दी जा रही है।
क्या नगर परिषद के पास इस पूरे लेन-देन का हिसाब है? क्या किसी निजी व्यक्ति या बिचौलिए को सार्वजनिक पार्क में दुकान लगाने के नाम पर रकम वसूलने का अधिकार दिया गया है?
नगर परिषद कर्मियों की भूमिका पर सवाल, संदीप पासवान का नाम भी चर्चा में
इस मामले में जुगसलाई नगर परिषद के कर्मियों की भूमिका को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। स्थानीय स्तर पर नगर परिषद के संदीप पासवान की भूमिका पिछले वर्ष भी चर्चा में रहने का दावा किया जा रहा है।
हालांकि, किसी अधिकारी या कर्मचारी की संलिप्तता को लेकर लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र जांच आवश्यक है। संबंधित अधिकारी का पक्ष सामने आए बिना किसी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं होगा।
लेकिन यदि पिछले वर्ष भी पार्क में पटाखा दुकानें लगाने को लेकर विवाद हुआ था, तो नगर परिषद को इस वर्ष पहले से ही स्पष्ट व्यवस्था करनी चाहिए थी।
सार्वजनिक पार्क नागरिकों के लिए होते हैं। बच्चों, बुजुर्गों और सुबह-शाम टहलने वाले लोगों के उपयोग के लिए बने पार्क को पटाखा बाजार में बदलने का निर्णय किस आधार पर लिया जा रहा है, यह नगर परिषद को स्पष्ट करना चाहिए।
उपायुक्त से सीधे सवाल: आदेश लागू कराने की जिम्मेदारी किसकी?
अब पूरे मामले में जिला प्रशासन और जमशेदपुर के उपायुक्त की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण हो गई है। यदि निर्धारित स्कूल मैदान के बजाय पार्क में पटाखा दुकानें लगाई जा रही हैं, तो प्रशासन को तत्काल स्थल का निरीक्षण कर अनुमति, लाइसेंस, सुरक्षा व्यवस्था और भंडारण की स्थिति की जांच करनी चाहिए।
उपायुक्त से सवाल है कि क्या उन्हें पार्क में दुकानें लगाने की तैयारी की जानकारी है? यदि जानकारी है, तो अब तक कार्रवाई क्यों नहीं हुई? और यदि जानकारी नहीं है, तो प्रशासनिक निगरानी व्यवस्था आखिर किस काम की है?
जुगसलाई नगर परिषद को भी स्पष्ट करना होगा कि क्या उसने पार्क में पटाखा बाजार लगाने की अनुमति दी है और यदि दी है, तो क्या रेलवे सुरक्षा, अग्निशमन व्यवस्था तथा जिला प्रशासन की निर्धारित शर्तों का पालन सुनिश्चित किया गया है?
हादसे का इंतजार या समय रहते कार्रवाई?
जुगसलाई की घनी आबादी, संकरी गलियां, सार्वजनिक पार्क और उसके बगल से गुजरती हावड़ा-मुंबई रेल लाइन को देखते हुए यह मामला केवल व्यापारिक व्यवस्था का नहीं, बल्कि सार्वजनिक सुरक्षा का है।
यदि किसी दुकान में आग लगती है, पटाखों में विस्फोट होता है या रेल परिचालन प्रभावित होता है, तो उसका असर केवल कारोबारियों तक सीमित नहीं रहेगा। इसकी चपेट में आम नागरिक, राहगीर और रेल यात्री भी आ सकते हैं।
अब देखना यह है कि उपायुक्त इस मामले में तत्काल जांच और कार्रवाई का आदेश देते हैं या फिर पिछले वर्षों की तरह शिकायतें, आरोप और सुरक्षा संबंधी सवाल दीपावली के बाद फाइलों में दबकर रह जाएंगे।
फतेह लाइव का सवाल स्पष्ट है—जुगसलाई सार्वजनिक पार्क में पटाखा बाजार लगाने की अनुमति किसने दी, सुरक्षा मानकों की जांच किसने की और कथित वसूली के पीछे कौन है? प्रशासन को इन सवालों का जवाब देना चाहिए, ताकि किसी संभावित हादसे से पहले जिम्मेदार लोगों की जवाबदेही तय हो सके।
डीसी बोले – लिखित भेजवाइए, फिर देखेंगे क्या करना है
वैसे इस प्रकरण पर डीसी राजीव रंजन का पक्ष जानने के लिए फतेह लाइव ने उनसे संपर्क किया। उन्होंने बात सुनते ही कहा कि मामले में लिखित शिकायत भिजवाएं, फिर देखेंगे क्या हो सकता है। एसडीएम अर्णब मिश्रा को भी पक्ष जानने के लिए फोन किया गया उन्होंने फ़ोन रिसीव नहीं किया।
हर साल शिकायत की होती है अनदेखी
बहरहाल, जानकारी के अनुसार रेल मंत्रालय से लेकर मुख्यमंत्री और डीसी तक प्रिंट मीडिया, सोशल मीडिया और ट्वीट के माध्यम से शिकायतें घुम चुकी हैं, बावजूद इस मामले को अनदेखा करना अपने आप में भ्रष्टाचारी को उजागर करने जैसा साबित होता है, जो आम जन के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है।
आपका विश्वास, आपकी फतेह।


































