माटी के कारीगरों के बीच पहुंचकर खुद बनाए दीये, स्थानीय उत्पादों को अपनाने और मेहनत का उचित मूल्य देने की अपील
फतेह लाइव, रिपोर्टर।
जमशेदपुर में दीवाली के जगमगाते पर्व पर मिट्टी के दीयों की रोशनी को बरकरार रखने और पारंपरिक कला से जुड़े कुम्हारों के चेहरे पर मुस्कान लाने की एक संवेदनशील पहल देखने को मिली। झारखंड की पूर्व सांसद सुमन महतो दीवाली की पूर्व संध्या पर स्थानीय कुम्हारों की बस्ती पहुंचीं और उनके साथ समय बिताकर उनके हुनर व मेहनत को करीब से समझा।

इस दौरान पूर्व सांसद ने खुद कुम्हार के चाक पर बैठकर मिट्टी के दीये तैयार किए। उनके इस प्रयास से कुम्हारों का उत्साह बढ़ा और पारंपरिक कला के प्रति सम्मान का संदेश भी सामने आया।
पूर्व सांसद सुमन महतो ने कहा कि मिट्टी के दीये केवल सजावट का सामान नहीं, बल्कि मेहनतकश कुम्हार परिवारों के सालभर के सपनों और उम्मीदों का प्रतीक हैं। उन्होंने कहा, “यह केवल मिट्टी की गढ़ाई नहीं है, बल्कि चाक पर घूमता हर दीया इन मेहनतकश कुम्हार परिवारों के सालभर के सपनों और उम्मीदों को आकार देता है। जब हम स्थानीय स्तर पर बने दीये खरीदते हैं, तो हम केवल रोशनी नहीं लाते, बल्कि किसी जरूरतमंद परिवार के घर में भी सच्चे अर्थों में दीवाली की खुशियां प्रज्वलित करते हैं।”
‘मेरी मेहनत खरीदो लोगों, मेरे घर भी दीवाली है’
आधुनिकता और चाइनीज झालरों के बढ़ते चलन के बीच पारंपरिक मिट्टी के दीये बनाने वाले कारीगर अपनी जीविका को लेकर संघर्ष कर रहे हैं। ऐसे में पूर्व सांसद ने स्थानीय कुम्हारों के श्रम का उचित मूल्य देने को उनके प्रति सच्ची संवेदना बताया।
उन्होंने जमशेदपुर की जनता, विशेषकर युवाओं से ‘वोकल फॉर लोकल’ के संकल्प को मजबूत करने और इस दीवाली स्थानीय कारीगरों के हाथों से बने मिट्टी के दीये खरीदने की अपील की।
इस अवसर पर एक भावुक संदेश भी लोगों का ध्यान खींचता नजर आया—”जरा सी आस पाली है, मेरी मेहनत खरीदो लोगों… मेरे घर भी दीवाली है।”
पूर्व सांसद की यह पहल केवल दीये बनाने तक सीमित नहीं रही, बल्कि उस पारंपरिक हुनर और मेहनत को सम्मान देने का संदेश भी बनी, जिसके सहारे अनेक कुम्हार परिवारों की दीवाली रोशन होती है।


































