झारखंड यूनिवर्सिटी आफ टेक्नोलाजी का प्रमाणपत्र सिर्फ इकलौते सरकारी कालेज में मान्य
निजी 75 फार्मेसी कालेज की मान्यता की जवाबदेही डिप्लोमा इन फार्मेसी परीक्षा समिति की
फतेह लाइव, रिपोर्टर।
झारखंड में डिप्लोमा इन फार्मेसी (डी फार्मा) में बड़ा गड़बड़झाला है। सूबे के एकमात्र बरियातु गवर्नमेंट फार्मेसी कालेज में पढ़ाई करेंगे तो झारखंड यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलाजी (जेयूटी) से प्रमाणपत्र मिलेगा। इससे इतर वर्तमान में मान्यता प्राप्त 75 निजी फार्मेसी संस्थानों में दाखिला लेंगे तो डिप्लोमा इन फार्मेसी परीक्षा समिति की मुहर मिलेगी। एक राज्य, एक पाठ्यक्रम और एक प्रमाणपत्र। मगर मान्यता अलग-अलग संस्थानों की। निजी फार्मेसी कालेजों के संचालकों ने सत्ता के गलियारों में ऐसा गठजोड़ बना रखा है कि वहां सारे निर्णय उनके मुताबिक होते रहे हैं। सारा खेल झारखंड यूनिवर्सिटी आफ टेक्नोलोजी को गौण कर डिप्लोमा इन फार्मेसी परीक्षा समिति को प्रभावी बनाए रखने में है।

भारत सरकार में उपभोक्ता मामलों की सचिव निधि खरे झारखंड कैडर की आइएएस हैं। 2018 में प्रधान स्वास्थ्य सचिव के नाते उनका मंतव्य था कि 2007 में गठित और 2011 में पुनर्गठित डिप्लोमा इन फार्मेसी परीक्षा समिति को भंग किया जाना चाहिए। झारखंड यूनिवर्सिटी आफ टेक्नोलोजी के जरिए फार्मेसी की परीक्षा ली जानी चाहिए। इसके बाद स्वास्थ्य विभाग के तत्कालीन प्रधान सचिव डॉ. नितिन मदन कुलकर्णी ने इस प्रक्रिया को आधिकारिक रूप से आगे बढ़ाया। जेयूटी प्रशासन और कुलपति के साथ कई उच्चस्तरीय बैठकों के बाद विधिवत यह तय हुआ कि शैक्षणिक सत्र 2019-20 और उसके बाद के सभी सत्रों की परीक्षाएं पूर्णतः जेयूटी द्वारा संचालित की जाएंगी। इसके लिए फार्मेसी काउंसिल ऑफ इंडिया को औपचारिक पत्र भी भेजा गया था। उनका तबादला हुआ और सारी कार्यवाही संचिका में रूकी रह गई।

फार्मेसी की शिक्षा में गोलमाल की जड़ तक जाकर प्रहार करने का अवसर फिर आया जब अपर मुख्य सचिव अरुण कुमार सिंह के जिम्मे स्वास्थ्य महकमा आया। फाइलों के भीतर पन्ने पलटना शुरू किए तो निजी फार्मेसी कॉलेजों में भारी अनियमितता, गलत तरीके से दाखिला और जरूरी संसाधन के बिना संचालन की पोल खुलती गई। अरुण कुमार सिंह ने इस गड़बड़झाले को रोकने के लिए निजी फार्मेसी संस्थान तंत्र से जुड़े सफेदपोश लोगों को बेनकाब करने का प्रयास किया।
जिम्मेदार अधिकारियों को तुरंत बर्खास्त करने तथा सख्त अनुशासनात्मक कार्रवाई की स्पष्ट अनुशंसा की थी। सकारात्मक यही हुआ कि 78 निजी फार्मेसी संस्थान बंद हो गए। आँख बंद कर उन्हें लाइसेंस दिए गए थे। शुरुआती जांच में पाया गया कि मान्यता की जरूरी शर्तों के मुताबिक थोड़ा बहुत वास्तव में था और बहुत कुछ कागजी था। ये संस्थान दनादन फार्मेसी की डिग्री बांट रहे थे। खैर, अब भी 75 निजी संस्थान झारखंड में चल रहे है। इन्हें जेयूटी के दायरे में नहीं लाया गया है और न ही डिप्लोमा इन फार्मेसी परीक्षा समिति भंग नहीं हुई है। वह आज भी प्रभावी है।
रामचन्द्र के जमाने से समानांतर व्यवस्था शुरू हुई तो बंद नहीं हुई
स्वास्थ्य मंत्री रामचन्द्र चन्द्रवंशी के जमाने से डिप्लोमा इन फार्मेसी परीक्षा समिति को प्रभावी किया गया। एक के बाद दूसरे विभागीय सचिव लिखते रहे कि झारखंड यूनिवर्सिटी आफ टेक्नोलोजी की जगह समानांतर संस्थान बनाना और उसे मान्यता देना ठीक नहीं है। कोई मंत्री राजी नहीं हुए, चाहे बन्ना गुप्ता हो या इरफान अंसारी।
गोलमाल हुआ तभी तो 78 फार्मेसी संस्थानों में लगाना पड़ा ताला
झारखंड में फार्मेसी की पढाई की पूरी व्यवस्था में गोलमाल हुआ है, तभी एकबारगी 78 शैक्षणिक संस्थानों में ताला लग गया है। जमीन, फैकल्टी, प्रयोगशाला, गलत तरीके से विधार्थी का निबंधन जैसी गड़बड़ी मिली तभी इतनी बड़ी संख्या में फार्मेसी संस्थान बंद किए या कराए गए हैं। फार्मेसी की पढ़ाई में 500 घंटे की अनिवार्य क्लिनिकल ट्रेनिंग अनिवार्य है। यह भी जांच का अहम विषय है।
जेपीएससी घोटाले की भनक लगी तो रजिस्ट्रार को हटाया
डिप्लोमा इन फार्मेसी परीक्षा समिति के तत्कालीन रजिस्ट्रार का आकस्मिक निधन हो गया तो सरकारी सेवा से बाहर के प्रशांत पांडेय को कुर्सी दे दी गई। उसके बाद फार्मेसी का गड़बड़झाला और बढ़ता गया। हो हल्ला भी बढ़ रहा था। इसी बीच जेपीएससी घोटाले का शोर बढ़ने लगा तो आनन फानन में प्रशांत पांडेय को हटा दिया गया। वे हाईकोर्ट गए तो तत्काल हटाने के आदेश पर स्टे भी लग गया। इसके बाद फार्मेसी की पढ़ाई से जुड़ी परीक्षा और रजिस्ट्रेशन समेत अधिकतर गतिविधियों पर सरकार ने अस्थाई रोक लगा दी है। विधार्थी पहले भी अधर में झूलते रहे हैं। आगे भी झूलते रहेंगे।
मरांडी ने सीएम को पत्र लिखा कि इडी और सीबीआइ जांच कराई जाय
नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को पत्र लिखा है कि फार्मेसी की पढ़ाई की व्यवस्था में 100 करोड़ भ्रष्टाचार हुआ है। इसकी इडी और सीबीआइ जांच होनी चाहिए। समानांतर व्यवस्था बनाने वाले स्वास्थ्य मंत्रियों और सचिवों की संपत्ति की जांच की आवश्यकता है।


































