(लेखक परविन्दर भाटिया पेशे से पत्रकार हैं)

देश और धर्म की रक्षा के लिए इतिहास में अनेक महापुरुषों ने अपने प्राणों की आहुति दी है. इन शहीदों की गाथाएँ अक्सर समय बीत जाने के बाद सामने आती हैं, जब उनके अनुयायी, प्रशंसक या फिर समर्पित इतिहासकार उस शौर्य और बलिदान को कलमबद्ध करते हैं. क्योंकि अत्याचारी हुकूमतों के काल में सच्चाई कहने की हिम्मत बहुतों में नहीं होती, और सत्ता के भय के कारण जुबानें खामोश रहती हैं. जब सत्ता बदलती है और कुछ समय बीत जाता है, तब जाकर सत्य बाहर आता है, पर अफसोस की बात यह है कि तब तक उस शहादत की असली तस्वीर धुंधली हो चुकी होती है, और जब कोई इतिहासकार उस घटना को लिखता है, तो उसकी सच्चाई अक्सर प्रशंसा और सहानुभूति की चादर में ढक जाती है. लेकिन सिखों के पांचवें गुरु, गुरु अर्जुन देव जी की शहादत की कहानी इससे अलग है. उनके बलिदान की गवाही खुद उनका कातिल, मुगल सम्राट जहांगीर ने अपनी आत्मकथा में दी है. इसलिए इसमें कोई लाग-लपेट नहीं, कोई अतिशयोक्ति नहीं – केवल निर्विवाद सत्य है.

जहांगीर ने अपनी आत्मकथा ‘तुजके जहांगीरी’ के पृष्ठ 35 पर लिखा है कि “व्यास नदी के किनारे गोइंदवाल नगर में अर्जुन नामक एक हिन्दू रहता था. वह बहुत से सीधे-साधे हिन्दुओं और यहाँ तक कि कुछ मूर्ख और अज्ञानी मुसलमानों को भी अपने अनुयायी बनाता था और अपने आपको पीर और वली कहलवाता था. लोग उसे गुरु कहते थे और दूर-दूर से आकर उसकी सेवा में उपस्थित होते थे. उसकी यह झूठी दुकान कई पीढ़ियों से चल रही थी. मैंने यह निर्णय लिया कि या तो इस दुकान को हमेशा के लिए बंद किया जाए या फिर उसे इस्लाम कबूल करवाया जाए.”

जहांगीर ने यह भी लिखा कि जब उसका बेटा खुसरो उस रास्ते से गुजर रहा था, तो वह अर्जुन देव जी से मिलने गया और उन्होंने उसके माथे पर तिलक लगाया – जिसे हिन्दू शुभ मानते हैं. जब यह बात जहांगीर को पता चली, तो वह क्रोधित हो गया और उसने गुरु अर्जुन देव जी को दरबार में तलब किया. उनके घर, परिवार और संपत्ति को जब्त कर लिया गया और उन्हें यातनाएँ देकर मौत के घाट उतारने का आदेश जारी किया गया. गुरु अर्जुन देव जी की शहादत की यह गाथा किसी प्रचार या सहानुभूति की मोहताज नहीं, बल्कि स्वयं इतिहास की गवाही है – एक ऐसी गवाही जो एक अत्याचारी सम्राट के शब्दों से उजागर हुई.

अपने को पीर और वली होने का प्रचार कर रहा था. लोग उसे गुरु कहते थे. चारों ओर से मूर्ख और मूर्खता के पुजरी उसकी सेवा में उपस्थित होकर उस पर अपना विश्वास प्रकट करते थे. तीन चार पुश्तों में उनकी झूठ की यह दुकान चल रही थी. मैंने यह फैसला किया कि या तो इस दुकान को बन्द कर दिया जाए. या उसे मुसलमान बना लिया जाए, उन्हीं दिनों खुसरू उस रास्ते से गुजर रहा था. मूर्ख शहजादा उसके दीदार करने का इच्छुक था. वह गुरु अर्जुन के पास गया उसने उसके माथे पर कैसर भरी उंगली लगाई, हिन्दु लोग उसको टीका कहते हैं. और इसे अच्छा शगुन समझते हैं. जब यह घटना मेरे कानों में पड़ी और चूंकि उस व्यक्ति के झूठ और फरेब को अच्छी तरह जानता था. मैंने हुक्म दिया कि उसे हाजिर किया जाए, मैंने उसके घर, घाट और बच्चों को मुर्तजा खां के हवाले कर दिया और उसके सब माल-जायजाद को जब्त करके कष्ट दे देकर मौत के घाट उतरने का हुक्म दिया.” जहांगीर की आत्मकथा जहांगीर के बाद भी शाही पुस्तकालय में बन्द रही. उस समय प्रेस नहीं हुआ करते थे. पुस्तकें हाथों से ही लिखी जाती थी. जब मुगल राज समाप्त हुआ तो अंग्रेजों ने बहुत सी हस्तलिखित पुस्तकें प्रकाशित की. इसी सिलसिले में जहांगीर की आत्मकथा “तुजके जहांगीरी” उन्नीसवीं सदी में नवल किशोर प्रेस, लखनऊ से प्रकाशित हुई. तब जाकर गुरु जी की शहादत के कारणों का खुलासा हुआ. गुरु जो 14 मई 1606 को लाहौर पहुंचे और 15 मई 1606 की उन्हें कष्ट दे देकर मौत के घाट उतार देने का हुक्म सुनाया गया. यह काम मुर्तजा खां को सौंपकर जहांगीर काबुल चला गया. गुरु जी 15 दिनों तक जेल में रहे. जैसा कि शाही फरमान में कहा गया था कि गुरु जी को कष्ट दे देकर मौत के घाट उतार दिया जाए, उन्हें ऐसे कष्ट दिये गये जिन्हें लिखने में ही हाथ कांपने लगते हैं. शाही फरमान की खबर सुनकर उस समय के महान मुसलमान फकीर हजरत मियां मीर गुरु जी की रिहाई के लिए मुर्तजा खां के पास पहुंचे मगर उसने साफ इन्कार कर दिया और कहा कि यह बादशाह का फरमान है. इसे बदला नहीं जा सकता. यह वही हजरत मियां मीर हैं जिनके हाथों गुरु जी ने स्वर्ण मंदिर की नीव रखवाई थी. जब वह जेल में गुरु जी से मिलने गए तो गुरु जी को दिये जा रहे कष्ट देखकर बहुत रोये. परन्तु शांति के अवतार गुरु जी-

“तेरा भाणा मीठा लागे हर नाम पदार्थ नानक मांगे”

शब्द की धुन में डूबे रहे. प्रसिद्ध इतिहासकार डॉ. गोकुलचन्द नारंग, जादूनाथ सरकार, मोहसन फानी, इन्द्रभूषण बनर्जी एवं मुंशी सोहनलाल आदि ने अनेक कष्टों के बारे में विस्तार से लिखा है. इस बात पर सभी इतिहासकार सहमत हैं कि अन्त में उन्हें उबलते हुए पानी में उबाला गया. उनका शरीर छाले छाले हो गया, उनके शरीर को रावी नदी में फेंक दिया गया. गर्म पानी में उबला हुआ शरीर जब रावी के ठण्डे पानी में डुबाया गया तो कोमल शरीर फट गया, वह 30 मई 1606 का दिन था जब

“सूरज किर्णा मिले जल का जल हुआ राम। ज्योति ज्योति रली सम्पूर्ण थीया राम ।।

उसी दिन की याद में सिख समुदाय ठण्डा और मीठा शरबत पिलाकर विश्व को शांति और सहनशीलता का संदेश देता है. गुरु अर्जुन सिख इतिहास में पहले शहीद हैं इसीलिए उनको शहीदों का सरताज कहा जाता है.

“ब्रहम ज्ञानी सब श्रष्टि का करता ब्रह्म ज्ञानी सद जीवे नहीं मरता.”

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