स्टेशन रोड पर चौक बाजार से घोड़ा चौक तक पक्की दुकानों में भी पटाखों की खुलेआम बिक्री, सुरक्षा मानकों की उड़ रही धज्जियां; नगर परिषद की भूमिका पर गंभीर सवाल
फतेह लाइव, रिपोर्टर।
जमशेदपुर के जुगसलाई में पटाखा बाजार को लेकर शुरू हुआ विवाद अब जिला प्रशासन और नगर परिषद की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। निर्धारित स्थल पर पटाखा दुकानें लगाने के प्रशासनिक निर्देशों के बावजूद जुगसलाई पार्क में बाजार सजने, घनी आबादी के बीच विस्फोटक सामग्री की बिक्री और स्टेशन रोड पर पक्की दुकानों में खुलेआम पटाखे बेचे जाने के आरोपों ने सुरक्षा व्यवस्था की पोल खोल दी है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब प्रशासन को पूरे मामले की जानकारी है, छापेमारी भी हो चुकी है और अधिकारियों को कार्रवाई के निर्देश भी दिए गए हैं, तो आखिर पटाखा कारोबार पर प्रभावी नियंत्रण क्यों नहीं दिख रहा?
मामले की गंभीरता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि स्थानीय निवासियों की ओर से तैयार लिखित शिकायत उपायुक्त कार्यालय पहुंच चुकी है। शिकायत में जुगसलाई पार्क में पटाखा दुकानों के संचालन, कथित अवैध आवंटन, आर्थिक वसूली और इसमें जनप्रतिनिधियों से जुड़े लोगों की भूमिका की जांच कराने की मांग की गई है। स्थानीय नागरिकों ने घनी आबादी के बीच पटाखा बिक्री से उत्पन्न अग्नि एवं जनसुरक्षा के खतरे को देखते हुए तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है।
निर्धारित आरपी पटेल ग्राउंड छोड़ पार्क में कैसे सज गया बाजार?
स्थानीय लोगों का आरोप है कि जिला प्रशासन और अनुमंडल पदाधिकारी की ओर से पटाखा दुकानों के लिए आरपी पटेल हाई स्कूल ग्राउंड निर्धारित किया गया था। इसके बावजूद जुगसलाई पार्क में दुकानें लगाने की अनुमति और व्यवस्था किसके निर्देश पर हुई, यह अब तक स्पष्ट नहीं है।
यदि प्रशासन की ओर से स्थल निर्धारित था, तो उसके विपरीत पार्क में दुकानें लगाने की अनुमति किसने दी? क्या इसके लिए कोई नया लिखित आदेश जारी हुआ था? यदि नहीं, तो नगर परिषद की जमीन पर पटाखा बाजार सजाने की जिम्मेदारी किसकी है?
यह केवल स्थान परिवर्तन का मामला नहीं है, बल्कि विस्फोटक सामग्री की बिक्री के लिए निर्धारित सुरक्षा व्यवस्था और प्रशासनिक आदेशों के अनुपालन का सवाल है।
छापेमारी हुई, लेकिन कार्रवाई का हिसाब कहां है?
जानकारी के अनुसार, गुरुवार सुबह अंचल अधिकारी के नेतृत्व में प्रशासनिक टीम ने जुगसलाई पार्क पहुंचकर जांच और छापेमारी की थी। लेकिन इस कार्रवाई में क्या मिला, किन दुकानदारों के दस्तावेजों की जांच हुई, कितनी दुकानें अवैध पाई गईं और किसके विरुद्ध कार्रवाई की गई, इसकी आधिकारिक जानकारी अब तक सार्वजनिक नहीं हुई है।
गुरुवार देर रात भी जिला प्रशासन की ओर से बड़ी कार्रवाई की चर्चा थी। इसके बावजूद यदि पटाखा कारोबार बेरोकटोक जारी रहा, तो सवाल उठना लाजिमी है कि छापेमारी का वास्तविक परिणाम क्या निकला?
केवल अधिकारियों का मौके पर पहुंचना कार्रवाई नहीं कहलाता। कार्रवाई तब मानी जाएगी, जब नियम तोड़ने वालों पर स्पष्ट कानूनी कदम उठें और आम नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित हो।
जनप्रतिनिधि के पति पर टेंट लगवाने का आरोप, नगर परिषद की भूमिका कठघरे में
स्थानीय लोगों ने एक जनप्रतिनिधि के पति पर जुगसलाई पार्क में पटाखा बाजार के लिए टेंट लगवाने का आरोप लगाया है।दूसरी ओर, पार्क नगर परिषद के अधीन होने के कारण कार्यपालक पदाधिकारी संदीप पासवान की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। स्थानीय नागरिकों का कहना है कि पार्क में टेंट लगाने और दुकानों की व्यवस्था होने के दौरान नगर परिषद की ओर से कोई प्रभावी आपत्ति या रोक नजर नहीं आई। यदि सरकारी संपत्ति पर बिना विधिवत अनुमति और प्रक्रिया के पटाखा बाजार लगाया गया है, तो इसकी जिम्मेदारी तय करना नगर परिषद प्रशासन का भी दायित्व है।
40 हजार रुपये तक वसूली का आरोप, सरकारी खाते में कितनी राशि पहुंची?
इस पूरे विवाद का सबसे गंभीर पहलू कथित आर्थिक वसूली है। विश्वस्त सूत्रों के हवाले से दावा किया जा रहा है कि पार्क में दुकान लगाने के लिए कुछ बिचौलियों और संबंधित तत्वों की ओर से प्रति दुकानदार 40 हजार रुपये तक वसूले गए हैं।
वहीं, चर्चा है कि नगर परिषद के सरकारी खाते में इसके मुकाबले महज 5 से 10 हजार रुपये तक की राशि ही दर्शाई गई है। यदि यह दावा सही है, तो सवाल सिर्फ अवैध आवंटन का नहीं, बल्कि सरकारी राजस्व को संभावित नुकसान और कथित आर्थिक अनियमितता का भी है।
किस दुकानदार से कितनी राशि ली गई? किसने वसूली की? किस मद में पैसा जमा हुआ? क्या पार्क के उपयोग के लिए कोई आधिकारिक टेंडर या आवंटन प्रक्रिया अपनाई गई? इन सवालों का जवाब जांच के बाद ही सामने आ सकता है। उपायुक्त को इस पूरे आर्थिक लेन-देन की निष्पक्ष जांच करानी चाहिए।
स्टेशन रोड पर भी बारूद का कारोबार, प्रशासन की नजर आखिर कहां?
जुगसलाई में विवाद केवल पार्क तक सीमित नहीं है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि मुख्य स्टेशन रोड पर चौक बाजार से लेकर घोड़ा चौक तक कई पक्के मकानों और दुकानों में भी पटाखों की बिक्री खुलेआम की जा रही है।
सबसे चिंताजनक स्थिति यह है कि घनी आबादी और व्यस्त बाजार क्षेत्र में पटाखों की बिक्री के दौरान अग्निशमन उपकरणों, सुरक्षित भंडारण और अन्य आवश्यक सुरक्षा मानकों के अनुपालन पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।
एक तरफ प्रशासन निर्धारित स्थल पर पटाखा बाजार संचालित कराने की बात करता है, दूसरी तरफ यदि मुख्य सड़क और पक्की दुकानों में भी बिना आवश्यक अनुमति पटाखे बेचे जा रहे हैं, तो फिर लाइसेंसिंग और निगरानी व्यवस्था किस काम की है?
क्या प्रशासन की कार्रवाई केवल एक पार्क तक सीमित है? क्या स्टेशन रोड की दुकानों की जांच हुई? कितनी दुकानों के पास वैध लाइसेंस हैं और कितनी दुकानों में सुरक्षा मानकों का पालन हो रहा है? इन सवालों पर जिला प्रशासन की चुप्पी स्थानीय नागरिकों की चिंता बढ़ा रही है।
ADM के निर्देश भी बेअसर? अब उपायुक्त से सीधे जवाब की उम्मीद
जानकारी के अनुसार, गुरुवार को एडीएम लॉ एंड ऑर्डर को भी इस मामले में त्वरित और सख्त कार्रवाई के निर्देश दिए गए थे। इसके बावजूद विवादित स्थल पर कारोबार जारी रहने की शिकायतें सामने आ रही हैं।
ऐसे में सवाल उठता है कि जब उपायुक्त कार्यालय तक मामला पहुंच चुका है, अनुमंडल स्तर पर आदेश जारी होने की बात कही जा रही है और एडीएम को कार्रवाई के निर्देश मिले हैं, तो फिर जमीनी स्तर पर नियमों का पालन क्यों नहीं कराया जा रहा?
स्थानीय लोगों की मांग है कि जुगसलाई पार्क में पटाखा दुकानों के आवंटन और संचालन की पूरी प्रक्रिया की जांच हो। कथित वसूली के आरोपों की वित्तीय जांच कराई जाए। नगर परिषद की भूमिका और संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही तय हो। साथ ही स्टेशन रोड की सभी पटाखा दुकानों के लाइसेंस एवं अग्नि सुरक्षा मानकों की जांच की जाए।
अब सवाल सीधा उपायुक्त से है: क्या जुगसलाई में पटाखा कारोबार के नाम पर नियमों की अनदेखी और कथित वसूली के आरोपों की निष्पक्ष जांच होगी? क्या जिम्मेदार अधिकारियों और प्रभावशाली लोगों की भूमिका की पड़ताल होगी, या फिर हर साल की तरह त्योहार बीतने के बाद यह पूरा मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा?
त्योहार खुशियों का प्रतीक है, लेकिन प्रशासनिक लापरवाही के कारण यदि किसी दिन जुगसलाई की घनी आबादी में कोई बड़ी अग्नि दुर्घटना होती है, तो उसकी जवाबदेही कौन लेगा? हादसे के बाद जांच बैठाने से बेहतर है कि प्रशासन अभी कार्रवाई करे।
फतेह लाइव का सवाल यही है—जब खतरा सामने दिखाई दे रहा है, तो प्रशासन कार्रवाई के लिए किसी हादसे का इंतजार क्यों कर रहा है?


































