चावलीबासा के पास NH-33 पर अचानक ब्रेक लगने के बाद हुआ हादसा, पूर्व मुख्यमंत्री और सुरक्षाकर्मी सुरक्षित
जैमर वाहन को नुकसान की खबर, 2024 से 2026 तक छह बार अधिकारियों को लिखे गए पत्रों के बावजूद नहीं सुधरी वाहनों की हालत
फतेह लाइव, रिपोर्टर।
सरकारी सुरक्षा व्यवस्था की जिम्मेदारी संभालने वाले विभागों की कार्यप्रणाली पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हुए हैं। झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री एवं पूर्व केंद्रीय मंत्री अर्जुन मुंडा के सुरक्षा काफिले में शामिल वाहन शुक्रवार शाम सरायकेला-खरसावां जिले के चौका थाना क्षेत्र में एनएच-33 पर दुर्घटनाग्रस्त हो गए। यह हादसा उस समय हुआ, जब अर्जुन मुंडा खूंटी से जमशेदपुर की ओर आ रहे थे। राहत की बात रही कि अर्जुन मुंडा और उनकी सुरक्षा में तैनात जवानों को कोई चोट नहीं आई।
हालांकि, इस घटना ने केवल एक सड़क दुर्घटना का मामला नहीं उठाया है, बल्कि सरकारी सुरक्षा वाहनों की हालत, उनकी तकनीकी विश्वसनीयता और काफिले के संचालन की व्यवस्था को भी सवालों के घेरे में ला दिया है।
चावलीबासा के पास अचानक ब्रेक, आपस में टकराए काफिले के वाहन
स्थानीय मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, चौका थाना क्षेत्र के चावलीबासा के समीप काफिले के आगे चल रही एक स्विफ्ट कार के अचानक ब्रेक लगाने के बाद पीछे चल रहे वाहनों को भी अचानक रफ्तार कम करनी पड़ी। इसी क्रम में काफिले के कुछ वाहन आपस में टकरा गए। दुर्घटना में जैमर वाहन को अधिक नुकसान पहुंचने की भी खबर है।
घटना के बाद कुछ देर के लिए मौके पर अफरा-तफरी की स्थिति बनी। चौका पुलिस के मौके पर पहुंचने और स्थिति संभालने की जानकारी भी सामने आई है। हालांकि, दुर्घटना की परिस्थितियों और वाहनों को हुए नुकसान का आधिकारिक विस्तृत ब्यौरा अभी स्पष्ट होना बाकी है।
हादसे के बाद अर्जुन मुंडा ने खोली सुरक्षा वाहनों की पोल
दुर्घटना के बाद अर्जुन मुंडा ने सोशल मीडिया के माध्यम से अपनी और सुरक्षाकर्मियों की कुशलता की जानकारी दी। इसके साथ ही उन्होंने राज्य सरकार की ओर से सुरक्षा के लिए उपलब्ध कराए जा रहे वाहनों की जर्जर स्थिति पर गंभीर चिंता जताई।
उनका कहना है कि यह केवल उनकी व्यक्तिगत सुरक्षा का मामला नहीं है, बल्कि दिन-रात ड्यूटी करने वाले सुरक्षाकर्मियों की जिंदगी से भी जुड़ा हुआ है। उनके कार्यालय की ओर से वाहनों की खराब हालत, बार-बार तकनीकी खराबी और सुरक्षा पर पड़ रहे प्रभाव को लेकर संबंधित अधिकारियों को लगातार पत्र लिखे जाते रहे हैं।
2024 से 2026 तक छह बार पत्राचार, फिर भी स्थायी समाधान नहीं
अर्जुन मुंडा के अनुसार, उनके कार्यालय ने इस संबंध में छह बार संबंधित अधिकारियों को लिखित रूप से अवगत कराया।
– 28 जुलाई 2024 — पत्रांक 10453
– 22 अगस्त 2024 — पत्रांक 10476
– 19 अप्रैल 2025 — पत्रांक 10740
– 11 सितंबर 2025 — पत्रांक 10905
– 9 मार्च 2026 — पत्रांक 11133
– 29 जून 2026 — पत्रांक 11298
इतना ही नहीं, गृह, कारा एवं आपदा प्रबंधन विभाग की ओर से भी 14 मार्च 2026 को पत्रांक 08/सुरक्षा(II)-01/2025, ज्ञापांक 1645 के माध्यम से आवश्यक कार्रवाई के लिए पत्र जारी किया गया था।
इसके बावजूद समस्या का स्थायी समाधान नहीं होने का आरोप है। अर्जुन मुंडा के मुताबिक, वाहनों की सामान्य मरम्मत कर उन्हें दोबारा सुरक्षा ड्यूटी में भेज दिया जाता है और कुछ ही समय बाद उनमें वही तकनीकी खराबियां सामने आने लगती हैं।
सायरन और झंडे तक की व्यवस्था पर सवाल, काफिले में घुस जाती हैं दूसरी गाड़ियां
पूर्व मुख्यमंत्री ने सुरक्षा काफिले में इस्तेमाल हो रहे पुराने वाहनों के साथ उनकी पहचान संबंधी व्यवस्थाओं पर भी सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि वाहनों पर सायरन और झंडे जैसी पहचान की व्यवस्था नहीं होने से आम वाहन चालकों को काफिले की जानकारी नहीं मिल पाती। कई बार दूसरी गाड़ियां काफिले के बीच में प्रवेश कर जाती हैं, जिससे सुरक्षा व्यवस्था प्रभावित होती है।
यह सवाल भी महत्वपूर्ण है कि जब सुरक्षा काफिला किसी व्यस्त राष्ट्रीय राजमार्ग से गुजरता है, तब उसके वाहनों की तकनीकी स्थिति, आपसी दूरी, संचार व्यवस्था और सुरक्षित संचालन की जिम्मेदारी किस स्तर पर सुनिश्चित की जाती है?
अब जवाबदेही तय करने का वक्त
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे गंभीर बात यह है कि शिकायतें एक-दो दिन पुरानी नहीं हैं। वर्ष 2024 से लगातार पत्राचार किए जाने और गृह विभाग की ओर से भी कार्रवाई के लिए पत्र जारी होने के बावजूद समस्या बने रहने का दावा किया गया है।
ऐसे में सवाल केवल यह नहीं है कि चौका के पास काफिले की गाड़ियां कैसे टकराईं, बल्कि यह भी है कि बार-बार तकनीकी खराबी की शिकायतों के बावजूद सुरक्षा वाहनों की स्थिति की समुचित समीक्षा क्यों नहीं हुई?
क्या संबंधित विभाग वाहनों का तकनीकी ऑडिट कराएगा? क्या पुराने और जर्जर वाहनों को सुरक्षा ड्यूटी से हटाकर निर्धारित मानकों के अनुरूप नए वाहन उपलब्ध कराए जाएंगे? और क्या इस मामले में जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय होगी?
अर्जुन मुंडा ने सवाल उठाया है कि क्या किसी बड़ी दुर्घटना या जनहानि के बाद ही जिम्मेदार अधिकारियों की नींद खुलेगी?सुरक्षा व्यवस्था में तैनात जवानों की जान भी उतनी ही कीमती है, जितनी उस व्यक्ति की जिसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी उन्हें सौंपी गई है। इसलिए इस घटना को महज एक काफिला दुर्घटना मानकर नजरअंदाज करना उचित नहीं होगा।
फतेह लाइव का सवाल है कि छह बार लिखित शिकायत और गृह विभाग के पत्र के बाद भी यदि सुरक्षा वाहनों की हालत नहीं सुधरी, तो आखिर जवाबदेही किसकी है?


































