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Jamshedpur : धर्म का वास्तविक स्वरूप : विराट की ओर अग्रसर होना ही सच्चा धर्म

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  • आनंद मार्ग प्रचारक संघ ने धर्म के वास्तविक स्वरूप पर किया विशेष सत्र आयोजित

फतेह लाइव, रिपोर्टर

जमशेदपुर में आनंद मार्ग प्रचारक संघ ने गदरा, टेल्को और बिरसा नगर के विभिन्न स्कूलों में सरस्वती शिशु विद्या मंदिर में एक विशेष सत्र का आयोजन किया. इस सत्र में आचार्य सत्याश्रयानन्द अवधूत ने षड्दर्शन और आनंद मार्ग विषय पर अपने विचार साझा किए. उन्होंने धर्म की वास्तविक परिभाषा देते हुए कहा कि धर्म केवल परंपराओं और रीति-रिवाजों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मानव जीवन की उच्चतम प्रवृत्ति है जो विराट की ओर ले जाती है. आचार्य ने प्रसिद्ध दार्शनिक सूत्र “बृहदेशना प्रणिधानं च धर्मः” का उल्लेख करते हुए कहा, “महद् की आकांक्षा करना और उसकी ओर बढ़ना ही धर्म है.”

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आध्यात्मिक विकास के साथ सच्चे धर्म का संबंध

आचार्य सत्याश्रयानन्द अवधूत ने आगे बताया कि प्रत्येक व्यक्ति अनंतता की खोज में है, चाहे वह इसे जानता हो या नहीं. जब कोई व्यक्ति अपने प्रयासों को इस लक्ष्य की ओर केंद्रित करता है और साधना के माध्यम से इसे प्राप्त करने का प्रयास करता है, तो यही सच्चा धर्म होता है. उन्होंने शास्त्रों से उद्धृत करते हुए कहा – “तस्मिन्नुपलब्धे परमा तृष्णा निवृत्तिः”, अर्थात जब ब्रह्म की प्राप्ति होती है तो समस्त तृष्णा स्थायी रूप से शांत हो जाती है. उन्होंने यह भी कहा कि आध्यात्मिक विकास और ब्रह्म की प्राप्ति ही जीवन का लक्ष्य है.

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समाज में धर्म का सच्चा स्वरूप और आनंद मार्ग का योगदान

समाज में धर्म के वास्तविक स्वरूप की बात करते हुए आचार्य ने कहा कि आज के समाज में धर्म को बाहरी आडंबरों और संकीर्ण विचारों तक सीमित कर दिया गया है. जबकि सच्चा धर्म आत्मविकास, विराट की ओर बढ़ने और समाज के कल्याण में योगदान देने से जुड़ा हुआ है. आचार्य ने बताया कि यदि हम इस विचार को आत्मसात करें, तो न केवल हमारी आध्यात्मिक उन्नति होगी, बल्कि समाज में भी सकारात्मक परिवर्तन आएगा. आनंद मार्ग प्रचारक संघ इस विचार को जन-जन तक पहुँचाने के लिए निरंतर प्रयासरत है, जिससे लोग सच्चे धर्म की साधना कर सकें और मानवता के कल्याण के लिए कार्य करें.

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