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Everything is fishy in the UP Association’s land matter : खाता न बही जो विजय राणा और डीपी शुक्ला बोले वही सही, अंदर पढ़ें क्या है जमीन घोटाले का गोलमाल

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पौने 8 करोड़ की जमीन ली, कार्यकारिणी समिति और आमसभा को बताया ही नहीं

सफाई दे रहे कि कोरोना काल होने के कारण कार्यकारिणी समिति की बैठक नहीं बुलाई

उसी वक्त उत्तर प्रदेश संघ के एमएनपीएस में यही लोग विद्यार्थियों की करा रहे थे ऑनलाइन क्लास

उत्तर प्रदेश संघ में सबसे बड़े पौने 8 करोड़ के सौदा के लिए कार्यकारिणी से ऑनलाइन भी बात नहीं

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आमसभा के कहने पर उच्च स्तरीय जांच हुई तो गौरी गांव की जमीन के सौदा में पकड़ाया गोलमाल

चांडिल के गौरी गांव में साढ़े चार एकड़ जमीन ली गई जो 1964 के खतियान में आदिवासी के नाम

दावा कि न्यायिक आदेश से गैर आदिवासी के लिए खरीद योग्य हो गई गौरी गांव की वह जमीन

उद्यमी अतुल और अनाहिता टॉक से खरीदा गया था भूखंड, मूल रैयतों से भी किया सुलहनामा

जल्द ही उद्यमी अतुल और अनहिता टॉक को विधि सम्मत तरीके से जानकारी लेगा उत्तर प्रदेश संघ

फतेह लाइव, रिपोर्टर.

उत्तर प्रदेश संघ में कुछ कार्य ऐसे हुए हैं जो इशारा करते हैं कि खाता न बही जो विजय सिंह राणा और डॉ डीपी शुक्ला बोले वही सही. संस्था की स्थापना के बाद हुए जमीन के सबसे बड़े सौदे को इस तरह अंजाम दिया गया मानो जो मन चाहे वो कर सकते हैं. चांडिल के गौरी गांव में तकरीबन साढ़े चार एकड़ जमीन पौने आठ करोड़ में खरीदी गई. संस्था के संविधान के मुताबिक कार्यकारिणी शांति की मंजूरी होनी चाहिए थी. आमसभा में योजना और बजट रखना चाहिए था. ऐसा कुछ नहीं हुआ.

सफाई दी गई कि कोरोना काल आ गया था. इसलिए किसी से बात करने का मौका नहीं मिला. रोचक है कि उत्तर प्रदेश संघ के एमएनपीएस स्कूल में उस वक्त विद्यार्थियों की ऑनलाइन क्लास हो रही थी. यही लोग करा रहे थे. कार्यकारिणी समिति की बैठक या आमसभा की ऑनलाइन बैठक के लिए एक लिंक तैयार नहीं किया जा सका. खैर, उत्तर प्रदेश संघ ने दो बार आंतरिक जांच कराई है. दोनों जांच में पाया गया कि जमीन की खरीद में पारदर्शिता नहीं है. गोलमाल है? विजय सिंह राणा, डॉ डीपी शुक्ला और देवेश अवस्थी को दोषी पाया गया है.

संघ के संविधान के मुताबिक अब उनकी सदस्यता खतरे में है. राणा पूर्व में टाटा स्टील के एमडी के पीए थे तो शुक्ला वर्कर्स कॉलेज के प्राचार्य रह चुके हैं. जमीन विक्रेता उद्यमी अतुल टॉक और उनकी पत्नी अनहिता टॉक को भी जमीन के संबंध में जानकारी उपलब्ध कराने और उसकी घेराबंदी में आवश्यक सहयोग के लिए उत्तर प्रदेश संघ द्वारा विधि सम्मत तरीके से संवाद किया जा सकता है. कारण कि जमीन का विवाद शुरू होने के बाद उत्तर प्रदेश संघ की नई कार्यकारिणी ने अतुल और अनहिता टॉक से मिलने का प्रयास किया. वो तैयार नहीं हुए. इसलिए अब उन लोगों से आवश्यक जानकारी हासिल करने के लिए उत्तर प्रदेश संघ कानून की मदद लेने पर विचार कर रहा है.

2019 में विजय सिंह राणा उत्तर प्रदेश संघ के अध्यक्ष थे, तो डॉ डीपी शुक्ला महासचिव. देवेश अवस्थी कोषाध्यक्ष की भूमिका में थे. उस वक्त गौरी गांव के अलावा और कुछ जमीनों की सूची जरूर बनाई गई. सिर्फ सीएनटी बता कर उन्हें खारिज कर दिया गया. गौरी गांव की जमीन इस आधार पर ली गई कि वो सीएनटी मुक्त है. तुर्रा यह कि 1964 के भू बंदोबस्त सर्वे खतियान में वो जमीन मोहन सिंह भूमिज यानी आदिवासी के नाम दर्ज है. सिर्फ एक खाता में रैयत की जाति अज्ञात दर्ज है जबकि दो खाता की भूमि आदिवासी के नाम पर है. दावा है कि 1967 से 1973 के बीच जगरूप सिंह नामक सामान्य कोटि के व्यक्ति को लंबे समय तक दखल के आधार पर सरायकेला सिविल कोर्ट से दिए गए न्यायिक आदेश पर स्वामित्व मिल गया है.

इसी आधार पर जमीन आदिवासी से गैर आदिवासी के नाम हस्तांतरित हो चुकी है. जगरूप सिंह से वह जमीन अतुल टॉक और उनकी पत्नी अनाहिता टॉक ने खरीदी थी. सालों बाद म्यूटेशन हुआ. पुलिस की मदद से दो दफा चहारदीवारी बनाने का प्रयास किया. विफल रहे. फिर वह जमीन उत्तर प्रदेश संघ को बेच दी, वह भी बिचौलिया के मार्फत. सीधे रुपए का कोई लेन देन नहीं. मनी ट्रेल लंबा है.

जमीन खरीद में गोलमाल की इस कहानी में कई ट्वीस्ट है. सरायकेला खरसावां जिला के चांडिल अंचल के गौरी गांव में छह साल पहले उद्यमी अतुल टॉक और उनकी पत्नी अनहिता टॉक से उत्तर प्रदेश संघ ने लगभग साढ़े चार एकड़ जमीन खरीदी है. छह साल गुजर जाने के बाद भी जमीन की पूरी तरह घेराबंदी नहीं हो सकी है. उत्तर प्रदेश संघ ने दो बार जमीन के मसले पर आंतरिक जांच कराई. पहली बार कार्यकारिणी समिति ने खुद के स्तर पर जांच का कार्य कराया. दूसरी बार वार्षिक आमसभा में सभी सदस्यों की मौजूदगी और सहमति से उच्च स्तरीय जांच समिति की घोषणा की गई. इसकी वीडियोग्राफी भी है. आंतरिक जांच में यह बात सामने आई कि उत्तर प्रदेश संघ की आमसभा और कार्यकारिणी समिति में कई दशकों से जमीन खरीदने का नीतिगत प्रस्ताव पारित होता रहा है. 2019 में उत्तर प्रदेश संघ के अध्यक्ष विजय सिंह राणा और महासचिव डॉ डीपी शुक्ला थे.

सितंबर 2019 में संघ की कार्यकारिणी समिति में जमीन लेने की बात कही. कहाँ और कितने में कौन सी जमीन लेनी है? इस पर चर्चा नहीं हुई. उसी दिन सिर्फ विजय सिंह राणा और डॉ डीपी शुक्ला ने बैठक कर गौरी गांव की जमीन लेने की दिशा में आगे बढ़ने का निर्णय लिया. फिर मार्च 2020 में उन लोगों ने गौरी गांव की जमीन के लिए ऐसे फर्म को अग्रिम भुगतान किया जिसे उस वक्त तक अतुल और अनहिता टॉक ने किसी तरीके से अधिकृत भी नहीं किया था. जुलाई 2020 में जमीन की रजिस्ट्री हुई. 2023 में उत्तर प्रदेश संघ की नई कार्यकारिणी अस्तित्व में आई. नई कार्यकारिणी के संज्ञान में यह बात आई कि तीन साल में जमीन की घेराबंदी नहीं हो पाई क्योंकि किसी तरह का विधि सम्मत विवाद है. कार्यकारिणी समिति ने अशोक पांडेय के नेतृत्व में जांच समिति बनाई.

जांच समिति ने पाया कि जमीन की खरीद में पारदर्शिता का अभाव रहा है। और भी कई तरह की गड़बड़ी हुई है. जांच रिपोर्ट को वार्षिक आमसभा में रखा गया तो डॉ डीपी शुक्ला ने तर्क दिया कि उन्हें अपना पक्ष रखने का पर्याप्त मौका नहीं दिया गया. आमसभा में डॉ डीपी शुक्ला और अध्यक्ष अखिलेश दुबे ने आम सहमति से अनुराग अग्निहोत्री के नेतृत्व में एक और जांच समिति का गठन किया. जांच समिति ने विजय सिंह राणा और डॉ डीपी शुक्ला का लिखित तौर पर पक्ष लिया. कार्यकारिणी समिति की बैठकों की कार्यवाही के दस्तावेजों का अध्ययन किया. उत्तर प्रदेश संघ के वर्तमान अध्यक्ष से बातचीत की. जमीन के विषय में विद्वान अधिवक्ता अभिजीत मंडल और मलकित सिंह का मंतव्य लिया. गौरी गांव जाकर जमीन का मुआयना किया गया. खतियानी रैयत के परिजन के अलावा ग्रामीणों से बात की गई.

इसके बाद दस्तावेजों के आधार पर टाटा स्टील के चीफ स्तर के रिटायरअधिकारी अनुराग अग्निहोत्री की अध्यक्षता में जेबी सिंह, ऐंजिल उपाध्याय, अश्विनी कुमार सिंह, कमलेन्दु शुक्ला, प्रताप भानु सिंह और एचसी तिवारी ने जांच रिपोर्ट तैयार की. इसके बाद वर्तमान अध्यक्ष समेत कार्यकारिणी समिति को सुपुर्द किया गया.

जमीन की खरीद में यह गड़बड़झाला

 

* गौरी गांव की जमीन 1964 के सर्वे खतियान में रैयत मोहन सिंह सरदार दर्ज है. गांव के ही जगरूप सिंह सामान्य जाति से है.लबे समय से दखल के आधार पर सरायकेला न्यायालय में तीन मुकदमों में उनकी जीत का दावा किया गया. उसी आधार पर उक्त जमीन के आदिवासी से गैर आदिवासी के नाम हस्तांतरित होने का दावा है. इसी आधार पर 2011 में जगरूप सिंह ने वह जमीन अतुल और अनाहिता टॉक को बेच दी. फिर 2020 में उक्त जमीन उत्तर प्रदेश संघ ने खरीदी है. हालांकि, उत्तर प्रदेश संघ की रजिस्ट्री में जगरूप सिंह के पक्ष में आए तथाकथित न्यायिक दस्तावेज को संलग्न नहीं किया गया. रोचक तथ्य यह है कि जगरूप सिंह के पक्ष के न्यायिक आदेश के आधार पर जमीन का म्यूटेशन हुआ है. मगर म्यूटेशन आदेश में भी वह न्यायिक आदेश संलग्न नहीं दिख रहा है. विजय सिंह राणा और डॉ डीपी शुक्ला ने जांच समिति को बताया कि आदिवासी से गैर आदिवासी के पक्ष में भूमि को हस्तांतरित करने का न्यायिक दस्तावेज उनके पास भी नहीं है.

* उत्तर प्रदेश संघ की वर्तमान कार्यकारिणी समिति ने जमीन विवाद की जांच तक चहारदीवारी समेत किसी तरह के निवेश पर रोक लगा रखी है. इसके बावजूद वर्तमान महासचिव डॉ डीपी शुक्ला ने पूर्व अध्यक्ष विजय सिंह राणा को पत्र दिया कि वे किसी एजेंसी से चहारदीवारी का निर्माण कराये. उल्लेखनीय है कि पिछले कार्यकाल में अध्यक्ष रहते विजय सिंह राणा और महासचिव डॉ डीपी शुक्ला ने उत्तर प्रदेश संघ ट्रस्ट का भी गठन किया जिसमें खुद संस्थापक ट्रस्टी बन गए है. ट्रस्ट को उत्तर प्रदेश संघ की यूनिट भी बना दिए है. उसी ट्रस्ट की देखरेख में चहारदीवारी बनाने शुरू किया गया, वह भी खुली निविदा के बगैर. जांच समिति ने उत्तर प्रदेश संघ के रहते समान उद्देश्य के लिए गठित ट्रस्ट की प्रासंगिकता और औचित्य पर भी प्रश्नचिन्ह खड़ा किया है.

* उत्तर प्रदेश संघ के जमीन खरीदने के बाद खतियानी रैयत मोहन सिंह के वंशजों ने वाद दायर किया. हाईकोर्ट तक गए. इसी बीच डॉ डीपी शुक्ला ने खतियानी रैयतों के साथ सुलहनामा किया. मोहन सिंह सरदार की वंशावली के आधार पर वंशजों के हिस्से की जमीन के लिए प्रति डिसमिल राशि देना तय किया गया. यह भी सुलहनामा हुआ कि वे लोग वाद उठा लेंगे. विद्यालय बनेगा तो उन लोगों को नौकरी भी मिलेगी. इसके बाद खतियानी रैयत के वंशजों ने वाद वापस भी ले लिया. इस सुलहनामा के तहत उत्तर प्रदेश संघ को और दो करोड़ रुपए व्यय करने होंगे.

* गौरी गांव में खरीदे गये भूखंड के तीन खतियान है. 1964 के भू सर्वे खतियान में दो खाता संख्या 34 और 131 की जमीन में रैयत मोहन सिंह सरदार और उनकी जाति के तौर पर अनुसूचित जनजाति दर्ज है. खाता संख्या 125 का खतियान भी मोहन सिंह के नाम पर दर्ज है. हालांकि, उसमें जाति और पिता का नाम दर्ज नहीं है. ऑनलाइन भी सिर्फ एक खाता में जगरूप सिंह, अतुल एवं अनहिता टॉक और उत्तर प्रदेश संघ का नाम दर्ज दिखता है. बाकी दो खाता में नहीं. जांच में यह बात आई कि जमीन खरीदने के पहले विधि सम्मत राय नहीं ली गई थी.

अतुल और अनहिता टॉक का सहयोग लेने का किया जाएगा प्रयास

2023 में अखिलेश दुबे के नेतृत्व में नई कार्यकारिणी का गठन के बाद जमीन का मसला संज्ञान में आया. जांच समिति को बताया गया कि अतुल और अनहिता टॉक से मिलने का प्रयास किया. उन्होंने विजय सिंह राणा और डॉ डीपी शुक्ला के बगैर किसी से मिलने से मना कर दिया. रजिस्ट्री दस्तावेज में अतुल और अनहिता टॉक ने जमीन के निर्विवाद होने और पोजिशन लेने में सहयोग की बात कही है. अब उत्तर प्रदेश संघ की कोशिश है कि जमीन की घेराबंदी में अतुल और अनहिता टॉक सहयोग करे. इसके अलावा जगरूप सिंह के पक्ष में आए न्यायिक आदेश उपलब्ध कराए जिसके आधार उन्होंने आदिवासी से गैर आदिवासी को हस्तांतरित जमीन पहली बार खरीदी थी.

सुनिए इनके बोल…

उत्तर प्रदेश संघ ने गौरी गांव की जमीन की खरीद की एक बार जांच कराई थी। फिर आमसभा हुई तो यह बात आई कि दोषी घोषित हुए लोगों की पूरी बात नहीं सुनी गई थी। उन लोगों के सुझाव पर अनसभा ने ही नई जांच समिति बनाई। दोबारा जांच हुई। जांच समिति ने कार्यकारिणी समिति को अपनी रिपोर्ट सौंप दी है। जांच रिपोर्ट को पढ़ा और समझा जा रहा है। उत्तर प्रदेश संघ के संविधान के मुताबिक आगे की कार्रवाई की जाएगी।

अखिलेश दुबे, अध्यक्ष, उत्तर प्रदेश संघ

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