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Fateh Live : संजय उवाच –  ‘संसद की गरिमा को बचाने की ज़रूरत

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प्रो.संजय द्विवेदी की कलम से.

देश की संसद हमारे लोकतांत्रिक आचरण, संसदीय मर्यादाओं और संवाद की शुचिता का केंद्र होनी चाहिए। जहां संवाद से संकटों के हल खोजे जाएं। लेकिन पिछले दो दिनों में लोकसभा में जो हुआ,वह बहुत निराशाजनक है। सदन के नेता प्रधानमंत्री ही अगर अपने सदन को संबोधित न कर सकें, इससे ज्यादा निराश करने वाली बात क्या हो सकती है। ये हुआ , सबने देखा। यह संसदीय मर्यादाओं के तार-तार होने का भी समय है। जब लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को यह अपील करनी पड़ी कि प्रधानमंत्री लोकसभा में न आएं और राष्ट्रपति के अभिभाषण पर हुई चर्चा का जवाब न दें।

लोकसभा अध्यक्ष ने किस तरह की आशंकाओं के कारण ऐसा कहा होगा, इसे समझा जा सकता है। इसके पहले सदन में हुए हंगामे, कागज फाड़कर आसंदी पर फेंकने जैसे दृश्य तो संसद ने अनेक बार देखे हैं। बावजूद इसके एक अभूतपूर्व दृश्य भी लोकसभा ने देखा जब लगभग सात महिला सांसद प्रधानमंत्री के आसन तक जा पहुंचीं। क्या हो सकता था, इसका अनुमान लगाना ठीक नहीं। किंतु बाद में लोकसभा अध्यक्ष ने जो कुछ कहा वह बताता है, संसदीय मर्यादाओं की सीमाएं लांघते हुए हमारे सांसद दिखे। परंपरा रही है कि धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा का जवाब आमतौर पर प्रधानमंत्री देते हैं।

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इसकी न सिर्फ अपेक्षा रहती है बल्कि प्रतीक्षा भी आखिर सरकार के मुखिया क्या कहते हैं। स्थापित मान्यता यहां टूटती दिखी। प्रधानमंत्री लोकसभा को संबोधित नहीं कर सके। राज्यसभा में भी उनका भाषण विपक्ष की गैरमौजूदगी में हुआ। संसदीय लोकतंत्र में विरोध और संवाद साथ -साथ चलते हैं। प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने संसद में पहले दिन से बहस और संवाद की संस्कृति को संरक्षित किया। वे यह चाहते थे अच्छे लोग संसद में आएं और संसदीय बहसों का स्तर ऊंचा हो। अपने विरोधी सांसदों की भी वे प्रशंसा करते हुए नजर आते हैं। दिग्गज सांसद राममनोहर लोहिया से लेकर युवा सांसद अटल बिहारी बाजपेई को भी उन्होंने ध्यान से सुना। यह परंपरा बाद के प्रधानमंत्रियों ने भी बनाए रखी।

विपक्ष भी अपने आचरण में मर्यादित रहा। संसद हमारे लोकतांत्रिक स्वभाव का आईना बनी रही। आपातकाल लागू होने के बाद क्षरण जरूर हुआ किन्तु बाद के दिनों में सब कुछ संभल गया। नरसिंहराव, चंद्रशेखर, अटलजी स्वयं बड़े संसदविद् थे और सदन गरिमा के साथ चलता रहा। कड़ी आलोचना के साथ , संवाद कायम रहा। पिछले कुछ समय से संवाद बंद है और कटुता बहुत बढ़ गई है। संसद शब्द की हिंसा का केंद्र बन गयी है। अपने सहयोगी सांसद को गद्दार की संज्ञा देना जैसे उदाहरण किसी भी तरह स्वीकार्य नहीं हैं। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए यह शुभ नहीं है। यह सही बात है कि सदन को चलाना सरकार की जिम्मेदारी है। लेकिन विपक्षी दलों के सहयोग के बिना सदन नहीं चल सकता यह भी सच है।

सदन में मिले विशेषाधिकार का लाभ लेकर सांसदों द्वारा हमारे महान दिवंगत नेताओं को कोसना, उनके जीवन के निजी पक्षों को किताबों के संदर्भ देकर उठाना कितना उचित है? इसके साथ ही बिना तथ्यों के किसी अनछपी किताब के उदाहरण से सरकार को घेरने की कोशिश भी बचकानी ही है। बजट सत्र संसद का बहुत महत्व का सत्र होता है। जिसमें हम अपने देश के आगामी एक साल के सपनों, आकांक्षाओं, आर्थिक भविष्य का खाका खींचते हैं। ऐसे सत्र का समय नष्ट करके हमें क्या हासिल होगा, समझना मुश्किल है। मुद्दे की बात यह भी है कि क्या हमारे सांसद स्वस्थ बहस चाहते हैं? क्या क्षणिक राजनीतिक सुर्खियों के लिए हम समाज के वृहत्तर प्रश्नों की उपेक्षा नहीं कर रहे हैं। दिवंगत नेताओं की चरित्रावली का वाचन करके हम कौन से मूल्य स्थापित कर रहे हैं? कभी नेता प्रतिपक्ष ने वीर सावरकर पर सवाल खड़े करके जो गलत परंपरा डाली, अब दूसरे सांसद बोरे में किताबें लाकर उनके अंश पढ़ रहे हैं।

इससे हमें क्या हासिल होगा? नेहरू जी, श्रीमती इंदिरा गांधी, अटल जी इस देश के महान नेता रहे हैं, उनके देहावसान के बाद ऐसी गलीज बातें राजनीतिक कार्यकर्ताओं को नहीं करनी चाहिए। मृत्यु के बाद हम पुरखों के सद्गुण याद करते हैं। उनके प्रदेय और योगदान पर गर्व करते हुए उन्हें श्रद्धांजलि देते हैं। किंतु हम किस रास्ते पर चल पड़े हैं? आजादी के इतने सालों बाद संसदीय बहस और संसदीय मर्यादाओं का स्तर ऊंचा करने के बजाय हम इसे रसातल में ले जा रहे हैं। कितना अच्छा होता कि हमारे सांसद यह समझ पाते कि देश की जनता ने उन्हें किन उम्मीदों से संसद में भेजा है। अगर सांसद ही तय लेंगे कि संसद नहीं चलेगी, तो उसे कौन चला सकता है। सांसद होना साधारण नहीं है, देश के 1 अरब, 40 करोड़ लोगों की आकांक्षाओं के प्रतिनिधियों का आचरण प्रश्नचिन्ह की तरह हमारे सामने है।

उम्मीद की जानी चाहिए कि सभी राजनीतिक दल ऐसे निराशाजनक दृश्यों से संसद को बचाने के लिए सोचेंगे। संसदीय राजनीति का यह पतन देखकर सबसे दुखी शायद पं.जवाहरलाल नेहरू और श्री अटल बिहारी वाजपेयी ही होते। दुर्भाग्यवश इन दोनों के राजनीतिक उत्तराधिकारी ही इन दृश्यों के लिए जिम्मेदार हैं। बाकी से क्या उम्मीद करना ?

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं।)

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