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Uttar Pradesh election gossip : वाराणसी और बांकीपुर में क्यों मुरझाया कमल?

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भाजपा में चुनावी हार पर आत्ममंथन की जगह खामोशी क्यों?

ठेका, ट्रांसफर और पोस्टिंग में उलझा संगठन, तो बूथ कौन संभालेगा?

आनंद सिंह।

देश के प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में विधान परिषद चुनाव में भाजपा हार जाती है, लेकिन पार्टी के भीतर कोई खास हलचल नहीं होती! भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष से जुड़ी बांकीपुर विधानसभा सीट पर उपचुनाव में पार्टी प्रत्याशी पराजित हो जाता है और थोड़ी-बहुत चर्चा के बाद मामला ठंडे बस्ते में चला जाता है! सवाल यह है कि आखिर भाजपा में चुनावी हार की जवाबदेही तय करने की परंपरा कहां खो गई है?

उत्तर प्रदेश में विधान परिषद चुनावों के नतीजे सामने आने के बाद क्या भाजपा ने किसी की जिम्मेदारी तय की? क्या किसी पदाधिकारी से जवाब मांगा गया? क्या संगठनात्मक स्तर पर कोई कार्रवाई हुई? बिहार में बांकीपुर की पराजय को लेकर प्रदेश भाजपा अध्यक्ष ने क्या कदम उठाए? इन सवालों का जवाब पार्टी के कार्यकर्ताओं और समर्थकों को मिलना चाहिए। चुनावी हार को महज एक घटना मानकर आगे बढ़ जाना किसी भी राजनीतिक संगठन के लिए शुभ संकेत नहीं है।

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वरिष्ठ पत्रकार और भाजपा की राजनीति पर गहरी पकड़ रखने वाले मेरे एक पूर्व संपादक ने अपने वीडियो में एक बेहद गंभीर टिप्पणी की है। उनका कहना है कि भाजपा के लोग अब संगठन खड़ा करने और उसे मजबूत बनाने की बजाय ठेका, ट्रांसफर और पोस्टिंग जैसे कामों में अधिक व्यस्त रहने लगे हैं। यह टिप्पणी केवल कुछ नेताओं की कार्यशैली पर सवाल नहीं उठाती, बल्कि संगठन की प्राथमिकताओं को लेकर भी गंभीर चिंता पैदा करती है।

उनका यह भी मानना है कि भूपेंद्र जी को उत्तर प्रदेश में जो संगठन मिला, उसे दुरुस्त करने में उन्होंने अपेक्षित रुचि नहीं दिखाई। यदि संगठन की कमजोरियां समय रहते दूर नहीं की गईं, तो चुनावी नतीजे लगातार चेतावनी देते रहेंगे और पार्टी नेतृत्व उन चेतावनियों को नजरअंदाज करता रहेगा

सबसे आश्चर्यजनक स्थिति वाराणसी को लेकर है। प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र में भाजपा को पराजय का सामना करना पड़ा और समाजवादी पार्टी की साइकिल आगे निकल गई। नतीजे आने के 48 घंटे से अधिक समय बीत जाने के बावजूद यदि पार्टी के भीतर जवाबदेही को लेकर कोई स्पष्ट संदेश नहीं दिखता, तो यह केवल एक चुनाव की हार का मामला नहीं रह जाता। यह संगठन की कार्यप्रणाली और नेतृत्व की गंभीरता पर भी सवाल खड़ा करता है।

कभी भाजपा की सांगठनिक ताकत का सबसे बड़ा आधार उसका समर्पित कार्यकर्ता हुआ करता था। बूथ स्तर पर काम करने वाले कार्यकर्ता, पन्ना प्रमुख और बूथ अध्यक्ष पार्टी की चुनावी रणनीति की रीढ़ माने जाते थे। पार्टी की सफलता के पीछे बूथ प्रबंधन की जिस व्यवस्था की चर्चा होती थी, आज उसी व्यवस्था की वास्तविक स्थिति पर सवाल उठ रहे हैं।

संगठन में अब दरी बिछाने, कार्यकर्ताओं के बीच बैठने और जमीन पर मेहनत करने की प्रवृत्ति कमजोर पड़ती दिख रही है। जिन्हें संगठन की जिम्मेदारी सौंपी जा रही है, उनमें से कुछ जिम्मेदारी निभाने के बजाय उसे दूसरों पर टालने में लगे हैं। पद और प्रभाव का इस्तेमाल यदि संगठन को मजबूत करने के बजाय निजी हित साधने में होने लगे, तो उसका खामियाजा अंततः पार्टी को ही भुगतना पड़ता है।

यह बीमारी झारखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में भी चिंता का विषय बन रही है। संगठन की कमजोरियों को दूर करने की जिम्मेदारी जिन नेताओं पर है, वे यदि जमीनी हकीकत समझने के बजाय दिल्ली में अपनी राजनीतिक गोटी फिट करने में अधिक ऊर्जा लगा रहे हों, तो फिर बूथ तक संगठन को मजबूत कौन करेगा?

उत्तर प्रदेश की राजनीति में समाजवादी पार्टी सोशल इंजीनियरिंग के जरिए अपना सामाजिक आधार बढ़ाने में जुटी है। विभिन्न सामाजिक समूहों को जोड़ने की उसकी रणनीति का असर चुनावी मुकाबलों में दिखाई देने लगा है। विधान परिषद चुनावों में मिली सफलता को इसी व्यापक राजनीतिक संदर्भ में समझने की जरूरत है।

ऐसे में सत्तारूढ़ भाजपा के नेताओं की प्राथमिकताएं क्या हैं? क्या वे बदलते सामाजिक समीकरणों को गंभीरता से समझ रहे हैं? क्या उन्हें पता है कि जमीन पर मतदाताओं का मिजाज किस दिशा में बदल रहा है? या फिर वे इस भरोसे में हैं कि केंद्र और प्रदेश की सत्ता में होने भर से चुनावी जीत सुनिश्चित होती रहेगी?

राजनीति में कोई भी सफलता स्थायी नहीं होती। मतदाता का समर्थन बनाए रखने के लिए लगातार संवाद, संगठनात्मक सक्रियता और स्थानीय स्तर पर भरोसा कायम रखना पड़ता है। केवल चुनाव के समय सक्रिय होने और प्रचार के सहारे मैदान जीतने की रणनीति लंबे समय तक कारगर नहीं रह सकती।

बांकीपुर उपचुनाव में भाजपा के बूथ प्रबंधन की स्थिति पर उठे सवालों को भी इसी नजरिए से देखने की जरूरत है। जिस बूथ मैनेजमेंट को भाजपा अपनी सबसे बड़ी चुनावी ताकत बताती रही है, यदि वह किसी महत्वपूर्ण चुनाव में ताश के पत्तों की तरह बिखरता दिखाई दे, तो यह सामान्य घटना नहीं है। यह इस बात का संकेत हो सकता है कि संगठन के भीतर कहीं न कहीं गंभीर खामियां पैदा हो चुकी हैं।

सबसे अधिक चिंताजनक स्थिति उत्तर प्रदेश की है। विधान परिषद चुनावों के नतीजे केवल हार-जीत का हिसाब नहीं हैं, बल्कि वे प्रदेश की बदलती राजनीतिक परिस्थितियों और संगठन की कमजोरियों के संकेत भी दे रहे हैं। इन संकेतों को समझना, उनका विश्लेषण करना और समय रहते सुधार करना भाजपा नेतृत्व की प्राथमिकता होनी चाहिए।

यदि पार्टी ने इन परिणामों से सबक नहीं लिया, तो अगले साल होने वाले चुनावों को लेकर उसका आकलन गलत साबित हो सकता है। दिल्ली में बैठे नेताओं को चुनावी परिस्थितियां जितनी आसान दिखाई दे रही हैं, जमीन पर मुकाबला उससे कहीं अधिक कठिन हो सकता है।

संगठन की कमजोरियों को दूर करने के लिए अब केवल बैठकों, भाषणों और समीक्षा के औपचारिक कार्यक्रमों से काम नहीं चलेगा। यह देखना होगा कि बूथ स्तर पर कार्यकर्ता सक्रिय हैं या नहीं, पन्ना प्रमुख अपनी जिम्मेदारी निभा रहे हैं या नहीं, स्थानीय पदाधिकारी जनता के बीच मौजूद हैं या नहीं और संगठनात्मक पदों पर बैठे लोग वास्तव में पार्टी के लिए कितना समय दे रहे हैं।

यदि जनवरी में चुनाव की घोषणा संभावित है, तो भाजपा के पास संगठन को दुरुस्त करने के लिए लगभग चार महीने का समय है। यह अवधि बहुत लंबी नहीं है। इस दौरान पार्टी को संगठन के ढीले पेच कसने होंगे, जिम्मेदारियों की समीक्षा करनी होगी और निष्क्रिय पदाधिकारियों के स्थान पर काम करने वाले लोगों को आगे लाना होगा।

सबसे जरूरी है कि चुनावी हार के बाद जवाबदेही तय करने की स्पष्ट व्यवस्था बने। केवल निचले स्तर के कार्यकर्ताओं से सवाल पूछने के बजाय उन नेताओं से भी जवाब मांगा जाए, जिनके हाथों में संगठन की जिम्मेदारी है। यदि जीत का श्रेय लेने में बड़े नेता आगे रहते हैं, तो हार की जिम्मेदारी से वे पीछे क्यों हटें?

भाजपा के सामने आज असली चुनौती केवल विपक्ष को पराजित करने की नहीं, बल्कि अपने संगठन को फिर से जमीन से जोड़ने की है। पार्टी को यह समझना होगा कि सत्ता संगठन का विकल्प नहीं हो सकती और राजनीतिक प्रभाव जमीनी मेहनत की जगह नहीं ले सकता।

वाराणसी की हार, बांकीपुर के सवाल और उत्तर प्रदेश के विधान परिषद चुनावों के नतीजों को अलग-अलग घटनाएं मानकर नजरअंदाज करना बड़ी भूल होगी। ये सभी परिणाम कम-से-कम एक सवाल जरूर पूछ रहे हैं—क्या भाजपा का संगठन अब भी कार्यकर्ताओं के दम पर चलता है, या संगठन के नाम पर चलने वाली व्यवस्था में निजी हित हावी होने लगे हैं?

इस सवाल का जवाब भाषणों से नहीं, कार्रवाई से मिलेगा। समय रहते संगठन की कमजोरियां दूर कर ली गईं, तो पार्टी के पास परिस्थितियां सुधारने का अवसर है। लेकिन यदि हार के बाद भी जिम्मेदारी तय नहीं हुई और जमीनी कार्यकर्ताओं की आवाज अनसुनी होती रही, तो आने वाले चुनाव भाजपा के लिए उतने आसान नहीं होंगे, जितने कुछ नेता अभी मानकर चल रहे हैं।

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