- जमशेदपुर स्वास्थ्य विभाग में मूल्य से अधिक कीमत पर हुई दवाओं की खरीद, निजी एजेंसी को फायदा पहुंचाने के लिए टेंडर फिक्सिंग का खेल
- फतेह लाइव ने पहले किया था खुलासा, एडीएम ने शुरू की जांच, डीपीएम पर लगे टेंडर फिक्सिंग के आरोप, सिविल सर्जन की भूमिका की भी हो जांच
- जेम पोर्टल पर हुए टेंडर में चहेती एजेंसी को काम देने लिए हार्ड कॉपी में जमा लिये गये दस्तावेज, जांच को दबाने के लिए हर स्तर पर हो रहा प्रयास
फतेह लाइव रिपोर्टर
जमशेदपुर स्वास्थ्य विभाग में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है. स्वास्थ्य मंत्री का करीबी बताने वाले जिला सिविल सर्जन कार्यालय से जुड़े टेंडरों में लगातार अनियमितताएं सामने आ रही है. हर बार जांच और कार्रवाई के नाम पर सिर्फ प्रशासन खानापूर्ति कर रहा, अब तक ऐसा कोई साक्ष्य सामने नहीं आया है जिससे यह कहा जाये कि प्रशासन अथवा विभाग की मंशा दूध का दूध और पानी का पानी करने की रही हो. हां यह बात जरूरत है कि दवाओं की खरीद में बड़े गोलमाल की शिकायतों पर जांच जरूर शुरू हो गयी है. इस जांच से सिविल सर्जन और डीपीएम के चेहरों पर तनाव दिखने लगा है.
सदर अस्पताल के लिए राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन ( एनएचएम) के तहत टेंडर कर दवाओं की खरीद में बड़े स्तर पर गड़बड़ी का खुलासा फतेह लाइव ने April 6, 2026 को अपनी रिपोर्ट में किया था. यह मामला स्वास्थ्य विभाग तक पहुंचा और इसके बाद जमशेदपुर सिविल सर्जन कार्यालय में चल रहे गड़बड़झाने की परत दर परत कड़ी खुलने लगी है. फिलहाल जिला प्रशसन ने सदर अस्पताल में दवा खरीद में बड़े गोलमाल और टेंडर फिक्सिंग की जांच एडीएम को सौंपी गयी है. तेज-तर्रार माने जाने एडीएम ने सोमवार को सिविल सर्जन को नोटिस भेजकर टेंडर से जुड़े मूल दस्तावेजों के साथ उन्हें तलब किया है. पूर प्रकरण की जांच में सिविल सर्जन को शामिल किये जाने को लेकर सवाल उठाये जाने लगे हैं.
- सदर अस्पताल में तीन से सात गुना अधिक मूल्य पर दवा की खरीद, बड़ा गोलमाल !
- जमशेदपुर स्वास्थ्य विभाग में तबादलों के नाम पर बदले सिर्फ कमरे, कहीं मेहरबानी-कहीं ढाया सितम !
- सिविल सर्जन का कारनामा, चहेते कंप्यूटर सहायक को बना दिया हॉस्पीटल मैनेजर!, डाॅक्टर से लेकर नर्स तक परेशान
बताया जाता है कि एनएचएम के तहत जारी की गई टेंडर प्रक्रिया में अनियमितता की शिकायत डीसी से भी की थी. इसमें टेंडर प्रक्रिया में नियम-कानून के साथ छेड़छाड़ करने का आरोप लगाया है. कहां तो यहां तक जा रहा है कि चहेती एजेंसी को काम देने के लिए नियमों को भी बदल दिया गया और जेम पोर्टर पर ऑनलाइन टेंडर में नियमों के विपरीत हार्डकॉपी तक जमा लिये गये. इस तरह सिविल सर्जन और डीपीएम की जानकारी में टेंडर फिक्सिंग की गयी. इसमें फर्जी दस्तावेजों का भी इस्तेमाल किये जाने की खबर है.
आठ गुना अधिक कीमत पर हुई हैं दवाओं की खरीद
मूल्य से अधिक कीमत पर दवाओं की खरीद के मामले में डीपीएम ने मीडिया को दिये बयान में अपना पल्ला यह कहकर झाड़ने का प्रयास किया है कि उनके प्रयास से ही अब तक चल रहे गोलमाल पर रोक लगी है. उनका कहना था कि अब तक 1.30 रुपए की दवा 8 रुपए में खरीदी जा रही थी. उन्होंने ही कोटेशन प्रक्रिया को बंद कराकर पारदर्शी ऑन लाइन टेंडर की प्रक्रिया शुरू करायी. हालांकि फतेह लाइव ने अपनी रिपोर्ट में अप्रैल माह में ही खुलासा कर दिया था अलग-अलग लॉट में दवाओं की खरीद में बड़े स्तर पर गोलमाल किया गया है. इसमें Resperid on 4mg की खरीद पिछले साल 0.90 पैसे में की गयी थी जबकि इस साल इसे 6.36 रुपये प्रति यूनिट की दर से खरीदा गया है. इसी तरह olanzapine 10 mg 0.58 के स्थान पर 6.76 रुपये, Sodium valporab 500 को 2.45 रुपये प्रति यूनिट की जगह 7.73 रुपये में खरीदा गया. ऐसे कई उदाहरण खरीद में बड़े स्तर पर गोलमाल की पुष्टि कर रहे हैं.
प्रशासन ने जांच कमेटी में ‘आरोपी’ को भी कर लिया शामिल
दवा खरीद और टेंडर गोलमाल की जांच के लिए एडीएम के साथ सिविल सर्जन डॉ. साहिर पाल को भी टीम में रखा गया है. उपायुक्त ने दो सदस्यीय कमेटी गठित की है. कमेटी को टेंडर की प्रक्रिया, दस्तावेजों की सत्यता और वित्तीय नियमों के उल्लंघन की जांच करेगी. हालांकि कमेटी में सिविल सर्जन को शामिल करने से ही जांच की निष्पक्षता को लेकर सवाल उठाये जाने लगे है. ऐसा माना जाता है कि जिला स्वास्थ्य विभाग के लिए टेंडर करने वाले डीपीएम की रिपोर्टिंग सिविल सर्जन को भी होती है. ऐसे में जिला स्वास्थ्य विभाग में किसी भी अनियमितता की जांच के दायरे में सीधे नहीं तो अप्रत्यक्ष रूप से सिविल सर्जन भी जांच के दायरे में आते हैं. ऐसे में उन्हें कमेटी का हिस्सा बनाना ही जांच की निष्पक्षता को सवालों के घेरे में ले आता है.
चहेते एजेंसियों की प्रोफाइल देखकर बनाया गया ‘बीओक्यू’ !
जमशेदपुर स्वास्थ्य विभाग में मूल्य से अधिक कीमत पर हुई दवाओं की खरीद, निजी एजेंसी को फायदा पहुंचाने के लिए टेंडर फिक्सिंग के इस खेल में कई तथ्य स्पष्ट इशारा करते है कि कुछ न कुछ तो ऐसा हुआ है जो टेंडर प्रक्रिया में शामिल लोगों की निष्पक्षता को कटघरे में ले आता है. यही कारण है कि शिकायतकर्ताओं ने टेंडर को तत्काल प्रभाव से रद्द कर संबंधित दस्तावेजों की जांच कराने की मांग उठायी है ताकि सच सामने आ सके. हालांकि पूरी प्रक्रिया में फिलहाल डीपीएम निशाने पर हैं. कहा तो यहां तक जा रहा कि टेंडर का “बीओक्यू” ही खास लोगों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया, ताकि दूसरी एजेंसी इस दौड़ में आ ही न सके. कई अलग-अलग फर्मों के टेंडर दस्तावेज एक ही तरह से बने है, कहां जा रहा है कि एक ही व्यक्ति ने अलग-अलग नाम से फर्म बनाकर टेंडर में हिस्सा लिया, जिसे फायदा पहुंचाने का आरोप डीपीएम पर लग रहा है.




