Jamshedpur : जत्थेदार दलजीत ने चुनाव जीतकर बनाया इतिहास, कोई पाठी पहली बार बना प्रधान, सीजीपीसी का किया विशेष धन्यवाद

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फतेह लाइव, रिपोर्टर.

जमशेदपुर के नामदाबस्ती गुरुद्वारा के प्रधान पद के लिए रविवार को हुए चुनाव को जीतकर जत्थेदार दलजीत सिंह ने एक इतिहास कायम किया है. दरअसल, जमशेदपुर के गुरुद्वारों में प्रधानगी पद पर आजतक केवल बाहुबली और धन के बली ही प्रधान बनते आये हैं. कई गुरुद्वारों में तो यह परम्परा भी हुई कि किसी प्रधान ने अपने भाई को कुर्सी पर बैठा दिया.

लेकिन नामदाबस्ती गुरुद्वारा में पहली बार ऐसा हुआ कि कोई ग्रंथी, पाठी सिंह प्रधान बना वह भी चुनाव जीतकर. 88 वोटों से जीत हासिल कर दलजीत ने अपने प्रतिद्वन्दवी को शिकस्त दी. विपक्ष ने दलजीत सिंह को चुनाव नहीं लड़ाने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी. विपक्ष के अलावा भी अंदर खाने से कुछ नेता, ने विरोध किया. बदनाम करने कि कोशिश की, लेकिन दलजीत पर संगत की ऐसी कृपा हुई कि उन्होंने सभी के मुंह बंद करा दिए. यह उनका मृदुभाषि होना भी एक वजह है. शहर भर के ग्रंथी, पाठी सिंह उनके समर्थन में गोलबंद होने लगे. सबों को उम्मीद थी कि हमारे बीच का कोई प्रधान बना तो उनकी भी कोई आवाज बनेगा. बहरहाल, दलजीत के सिर जीत की माला पहनाने में सेंट्रल गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी का भी सराहनीय योगदान रहा. निष्पक्ष चुनावी प्रक्रिया को देर ही सही शुरु कराया और उसे संपन्न भी कराया. दलजीत सिंह ने इसके लिए सीजीपीसी प्रधान भगवान सिंह, महासचिव अमरजीत सिंह, सीजीपीसी की ओर से भेजे गए मुख्य चुनाव पदाधिकारी परविंदर सिंह सोहल का तहे दिल से धन्यवाद किया है.

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नए प्रधान से पाठी सिंहों को कई उम्मीदें, क्या पूरा करेंगे दलजीत?

जमशेदपुर में बहुत कम ही ऐसा देखने को मिला है कि प्रधानगी के लिए जो लोग कूदफान करते हैं. प्रशासन से लेकर बयानबाजी करके समाज को कठघरे में खड़ा करते हैं उन्हें गुरमुखी का ही ज्ञान नहीं होता. किसी को नितनेम नहीं आता. इक्का दुक्का प्रधानों को छोड़ कोई होगा जो यह मर्यादा निभाता है. चुनाव जीतकर दलजीत सिंह ऐसे प्रधान बने हैं, जिन्हें श्री गुरु ग्रंथ साहेब की बाणी का ज्ञान हैं. उनसे पाठी सिंह को भी उम्मीद है कि उनकी मांग पूरी होंगी.

एक अखंड पाठ करके दो दिनों 800 रूपये अर्जित करने वाले पाठी सिंह कैसे परिवार का भरण पोषण करते हैं. दलजीत सिंह खुद भी ग्रंथी रह चुके हैं. विभिन्न छोटे छोटे गुरुद्वारों में रहने वाले ग्रंथियों की समस्या को वह अच्छी तरह समझ सकते हैं. जिस तरह युवा पीढ़ी सिख विरासत से दूर हो रही है, और नए पाठी सिंह तैयार नहीं हो रहे हैं. इन सब चीजों से दलजीत निपटते हैं या फिर जमशेदपुर के अन्य प्रधानों की तरह वह भी मशगूल हो जाते हैं मूंछ को ताव देने में? संगत की उन पर पैनी नजर बनी रहेगी.

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