प्रधानमंत्री का सपना कब होगा पूरा, राष्ट्रपति का आगमन भी कहानी का हिस्सा, बिष्टुपुर में भाजपा नेता डीडी बार भी संलिप्त
फ़तेह लाइव, रिपोर्टर।
टाटानगर स्टेशन रोड से बागबेड़ा कीताडीह जाने वाली सड़क का बुरा हाल है। पिछले दिनों यहां रेलवे ने बहुत बड़ा अतिक्रमण हटाओ अभियान चलाया था। दशकों से बसे लोग उजाड़े गए। मकसद केवल एक था। टाटानगर स्टेशन का विस्तार। यह एक ऐसी योजना है जो देश के प्रधानमंत्री का सपना है। हालांकि बात दूसरी है की मौसम ख़राब होने के कारण उनका आगमन टाटानगर में नहीं हो सका, लेकिन तैयारियां पूरी थी।
रंगरोगन से लेकर करोड़ों खर्च हुए केवल प्रधानमंत्री आ रहे हैं। साढ़े चार हजार करोड़ की लागत से क्षेत्र को अमृत भारत योजना से जोड़ेंगे। इलाके का विकास होगा। लेकिन हुआ उसके उलट। फिर बारी आई राष्ट्रपति के आने की। वह भी आई। फिर वही रंग रोगन हुआ। व्यवस्था टाइट हुई, लेकिन अमृत भारत योजना को दागदार होते ही जनता देख रही है।
खैर बातें लंबी है, कुछ अधिकारिक हैं और कुछ जनता के पक्ष की। थोड़ा पीछे लौटते हैं। प्रधानमंत्री जब यहां चुनाव के वक्त आने वाले थे, तब मौसम बिगड़ गया, वह शहर आएं लेकिन स्टेशन में करीब 50 करोड़ के खर्च होने वाले कार्यक्रम में नहीं। फिर दौर आया राष्ट्रपति का। वह गुजरी भी और इलाके को चमका गई। वैसी ही व्यवस्था देखी गई जब प्रधानमंत्री आने वाले थे। कई उजड़े, कई बिगड़े।
वैसे यह खेल दशकों से बसे लोगों ने भी नहीं देखा होगा। क्यूंकि यह बताने वाला कोई नहीं। हां एक बार चुनावी समय में राजनाथ सिंह आये थे। खैर, वह चुनावी जुमला था। अब वापस लौटते हैं मुख्य शीर्षक में।
अमृत भारत योजना के तहत जिस बागबेड़ा किताडीह रोड से दुकानदारों को हटाया गया, आज वहां अतिक्रमण फल फुल गया है। जिम्मेदार अधिकारी वही हैं, जिन्होंने यहां सख्ती से बुलडोजर चलवाया था। थोड़ा सीमा क्षेत्र का बदलाव जरूर हुआ है। जहां आपसी तालमेल की कमी साफ झलकती है।
कुछ दिनों पहले जो स्टेशन गुलजार रहता था, वह बिष्टुपुर में डीडी बार की घटना के बाद एसएसपी और अन्य तक के बदलाव के घटनाक्रम को लेकर बर्बाद होते गया। अब वह क्षेत्र जहां अमृत भारत योजना के तहत विकास होना है वहां दशकों से स्टेशन क्षेत्र में फुटपाथ पर बैठे दो यादव जी अपना डेरा जमा लिए हैं। दिलचस्प बात यह है कि रोड उस पार और मीटर मीटर दूर रहने वाले इन यादव जी ने ऐसी तालमेल बिठाई है कि चावल और चाय के रेट बढ़ गए हैं। सुबह चावल बिकेंगे, आधी रात चाय। अन्य बातों में साफ कहा जाये तो स्टेशन के बाहर आने वाले यात्रियों के नाम पर बसे यह लोग अपराधिक प्रवृत्ति को संरक्षण दे रहे हैं, जहां आने वाले समय में सीसीटीवी फुटेज भी प्रशासन को मिलने वाली नहीं और लल्लू मस्त रहेगा?
खैर, उस इलाके में रात के समय एक रेलकर्मी की हत्या हुई थी। अब वहां जो जमावड़ा है वह फिर कोई घटना को दावत देने वाला साबित तो हो रहा है, लेकिन तड़के तीन बजे के बाद का नजारा बागबेड़ा पुलिस की बल्ले बल्ले करने वाला साबित हो रहा है और वहां से गुजरने वाले आम जन के लिए होले होले जाने का अर्थात धीरे धीरे चलो, यादव जी की मुरीद हो गई है बागबेड़ा पुलिस, जो दो-दो जिलों में बड़े पुलिस अधिकारियों के बदलाव के बाद भी सुस्त है। (पूरा शहर बंद होने का दावा फेल, कैसे हुई सांठ गांठ, स्टेशन टीओपी के पीछे क्या जुड़ा है राज, खुलासा जल्द)




































