सीजीपीसी प्रधान ने उठाया सवाल—सदस्यता और पद स्वीकार, लेकिन विवाद के समय संविधान से दूरी क्यों?
फतेह लाइव, रिपोर्टर।
जमशेदपुर के सिखों की सर्वोच्च धार्मिक संस्था सेंट्रल गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (सीजीपीसी) के प्रधान भगवान सिंह ने साकची गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के हालिया रुख पर गंभीर सवाल उठाते हुए कहा कि यह लड़ाई किसी व्यक्ति या पद की नहीं, बल्कि संगत की भावना, संस्था की मर्यादा और संविधान के सम्मान की है।
उन्होंने कहा कि यदि साकची गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के अपने संविधान में किसी अन्य संस्था की सदस्यता को लेकर रोक है, तो संगत को यह जवाब मिलना चाहिए कि कमेटी वर्षों तक सीजीपीसी की सदस्य किस संवैधानिक आधार पर रही। सीजीपीसी की व्यवस्था में प्रतिनिधित्व और पद स्वीकार करना, लेकिन विवाद उत्पन्न होने पर उसके संविधान एवं अधिकारों को नकारना, गंभीर विरोधाभास है।
भगवान सिंह ने कहा कि साकची की संगत किसी व्यक्ति की निजी संपत्ति नहीं है। कुछ लोग अपनी सुविधा, व्यक्तिगत मतभेद या कुर्सी बचाने के लिए पूरी संगत और संस्था के भविष्य का फैसला नहीं कर सकते। यदि संविधान से कोई आपत्ति है तो उसके संशोधन का लोकतांत्रिक और वैधानिक रास्ता खुला है, लेकिन संस्था से संबंध तोड़ लेना समाधान नहीं हो सकता।
उन्होंने कहा कि सीजीपीसी का संघर्ष साकची की संगत के खिलाफ नहीं, बल्कि संगत के अधिकारों और संस्थागत व्यवस्था की रक्षा के लिए है। व्यक्तिगत मतभेद को पूरी संस्था की लड़ाई बनाना उचित नहीं है।
भगवान सिंह ने कहा कि निबंधन विभाग ने सीजीपीसी को लेकर कोई ऐसा आदेश जारी नहीं किया है, जैसा प्रचारित किया जा रहा है। उन्होंने दावा किया कि सीजीपीसी का संविधान वर्ष 2007 से निबंधित है और विभाग ने आवश्यक प्रक्रियागत त्रुटियों को दूर करने की बात कही है। साकची गुरुद्वारा के निबंधन से जुड़े तथ्यों और कथित प्रक्रियागत त्रुटियों की पूरी जानकारी भी निबंधन विभाग को दी जाएगी।
उन्होंने कहा कि संगत के साथ खिलवाड़ नहीं होना चाहिए। व्यक्ति और पद आते-जाते हैं, लेकिन संस्थाएं आने वाली पीढ़ियों की अमानत होती हैं। व्यक्ति से मतभेद हो सकता है, संस्था से दुश्मनी नहीं। कुर्सी के लिए संविधान और संगत की भावना से समझौता किसी कीमत पर स्वीकार नहीं किया जा सकता।









































