2023 में सदस्यता के लिए किया था आवेदन, रूस और चीन से समर्थन जुटाने की कोशिश; लेकिन BRICS में नए सदस्य के प्रवेश के लिए मौजूदा सदस्यों की सहमति जरूरी
फतेह लाइव, रिपाेर्टर।
भारत में आज से BRICS शिखर सम्मेलन शुरू हो रहा है। दुनिया की बड़ी उभरती अर्थव्यवस्थाओं के इस मंच पर कई देशों की नजरें टिकी हैं। इसी बीच एक ऐसा देश भी चर्चा में है, जो लंबे समय से BRICS के दरवाजे पर दस्तक दे रहा है—पाकिस्तान।
इस्लामाबाद ने वर्ष 2023 में BRICS की सदस्यता के लिए औपचारिक आवेदन किया था। इसके बाद पाकिस्तान ने संगठन के प्रभावशाली देशों से समर्थन हासिल करने की कोशिश तेज की। रूस और चीन के साथ अपने रिश्तों का हवाला देते हुए पाकिस्तान लगातार BRICS में शामिल होने की इच्छा जताता रहा है। हालांकि, उसकी राह अब तक आसान नहीं हुई है।
पाकिस्तान के लिए BRICS इतना महत्वपूर्ण क्यों?
पाकिस्तान की दिलचस्पी सिर्फ कूटनीतिक नहीं बल्कि आर्थिक भी है। आर्थिक संकट, विदेशी मुद्रा की जरूरत और IMF तथा दूसरे अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों पर निर्भरता के बीच इस्लामाबाद BRICS को आर्थिक और रणनीतिक विकल्प के रूप में देखता है। BRICS का प्रभाव लगातार बढ़ा है। भारत के विदेश मंत्रालय के अनुसार, समूह में अब 11 प्रमुख उभरती अर्थव्यवस्थाएं शामिल हैं और यह दुनिया की करीब 49.5 प्रतिशत आबादी तथा लगभग 40 प्रतिशत वैश्विक GDP का प्रतिनिधित्व करता है। यही वजह है कि पाकिस्तान के लिए इस समूह का हिस्सा बनना अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी आर्थिक और राजनीतिक स्थिति मजबूत करने का अवसर माना जा रहा है।
2023 में पाकिस्तान ने क्यों लगाई थी दावेदारी?
पाकिस्तान ने नवंबर 2023 में BRICS की सदस्यता के लिए औपचारिक अनुरोध किए जाने की पुष्टि की थी। तत्कालीन पाकिस्तानी विदेश कार्यालय ने BRICS को विकासशील देशों का महत्वपूर्ण मंच बताते हुए कहा था कि इस समूह में शामिल होकर पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय सहयोग और बहुपक्षवाद को मजबूत करने में योगदान देना चाहता है।
इसके बाद पाकिस्तान ने सदस्य देशों के बीच समर्थन जुटाने की कोशिश शुरू की। पाकिस्तान के रूस में राजदूत ने भी रूस की सरकारी समाचार एजेंसी से बातचीत में कहा था कि इस्लामाबाद सदस्यता के समर्थन के लिए अलग-अलग BRICS देशों से संपर्क कर रहा है।
असली अड़चन कहां है?
यहीं भारत की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। BRICS का विस्तार किसी एक देश के फैसले से नहीं होता। 2023 के जोहान्सबर्ग शिखर सम्मेलन में संगठन ने विस्तार के लिए सहमति आधारित सिद्धांत, मानदंड और प्रक्रिया तय की थी।
ऐसे में पाकिस्तान के लिए केवल चीन या रूस का समर्थन पर्याप्त नहीं है। उसे मौजूदा BRICS सदस्यों के बीच व्यापक सहमति हासिल करनी होगी।
भारत और पाकिस्तान के बीच लंबे समय से चले आ रहे राजनीतिक और सुरक्षा संबंधों को देखते हुए इस्लामाबाद की सदस्यता की कोशिश इसलिए और दिलचस्प बन जाती है।
BRICS लगातार बड़ा होता गया
BRICS का विस्तार पिछले कुछ वर्षों में तेजी से हुआ है। 2024 में मिस्र, इथियोपिया, ईरान और UAE पूर्ण सदस्य बने। इसके बाद जनवरी 2025 में इंडोनेशिया भी पूर्ण सदस्य के रूप में शामिल हुआ। साथ ही कई देशों को पार्टनर कंट्री के रूप में जोड़ा गया। इस विस्तार ने BRICS को पहले की तुलना में कहीं बड़ा वैश्विक मंच बना दिया है।
पाकिस्तान की नजर सिर्फ सदस्यता पर नहीं
पाकिस्तान के लिए BRICS की सदस्यता का मतलब केवल बैठकों में शामिल होना नहीं है। इस्लामाबाद इसे निवेश, व्यापार, विकास वित्त और वैश्विक कूटनीति में अपनी स्थिति मजबूत करने के अवसर के तौर पर देखता है।
BRICS से जुड़े New Development Bank जैसे संस्थानों में भागीदारी भी विकासशील देशों के लिए वैकल्पिक वित्तीय सहयोग का रास्ता खोलती है। यही कारण है कि पाकिस्तान लगातार इस समूह में प्रवेश की कोशिश कर रहा है।
अब सबसे बड़ा सवाल—क्या पाकिस्तान को मिलेगी एंट्री?
फिलहाल पाकिस्तान की कोशिश जारी है, लेकिन उसकी सदस्यता को लेकर कोई अंतिम फैसला नहीं हुआ है। BRICS की विस्तार प्रक्रिया में मौजूदा सदस्यों की सहमति अहम है।
इसलिए पाकिस्तान के लिए असली चुनौती सिर्फ रूस और चीन का समर्थन हासिल करना नहीं, बल्कि पूरे BRICS में सहमति बनाना है। भारत में चल रहे इस शिखर सम्मेलन के बीच पाकिस्तान की पुरानी सदस्यता की कोशिश एक बार फिर चर्चा में आ गई है। अब देखना दिलचस्प होगा कि आने वाले समय में इस्लामाबाद की कूटनीतिक कोशिशें रंग लाती हैं या BRICS के दरवाजे पर उसकी दस्तक अभी और लंबी होती है।




































