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Bangladesh incident : उन्मादी भीड़ भविष्य के परिणामों को भूल जाता है

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निशिकांत ठाकुर.

हिंदू और मुसलमानों के बीच ऐसी भी क्या नफरत है कि वे जब भी जहां भी अवसर मिलता है एक दूसरे पर टूट पड़ते हैं। समाज के बीच रहकर यदि कुछ अनबन हो जाए, तो उसे सहजता से मिलबैठकर सुलझाया भी जा सकता है, लेकिन आज ऐसा नहीं हो पा रहा है। मामूली बात को भी इतना तूल दिया जाता है कि हत्या तक कर दी जाती है। यही तो बांग्लादेश के ढाका में हुआ है। ढाका की एक फैक्ट्री में कार्य करने वाले युवा मजदूर दीपू चंद्र दास को ईशनिंदा के आरोप में पीट—पीटकर मार दिया गया।

यह ठीक है कि जब भीड़ उन्माद पर उतारू हो जाती है, तो वह उन्माद के अगले प्रभाव पर विचार नहीं करती है, लेकिन ऐसा भी क्या उन्माद कि हम किसी को पीट—पीटकर मार दें। ऐसा नहीं है कि इस तरह के उन्मादी केवल बांग्लादेश में ही रहते हैं, भारत तथा विश्व में इस तरह के सांप्रदायिक उन्माद पर अकूत विश्वास रखने वाले सभी देशों में प्रायः समय—समय पर पाए जाते रहते हैं। आखिर इस दुराग्रहपूर्ण मानसिकता को कैसे बदला जाए, इस पर तो कोई एक दो देश को नहीं, पूरे विश्व को विचार करना होगा। वैसे भारत के अतिरिक्त विश्व के सभी इस्लामिक देशों में इस तरह ईशनिंदा पर सजा का प्रावधान है।

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बांग्लादेश के मैमन सिंह (ढाका) में उन्मादी  भीड़ द्वारा मारे गए हिन्दू युवक दीपू चंद्र दास के विरुद्ध धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाली या किसी की भावना को ठेस पहुंचाने संबंधी प्रमाण पुलिस को नहीं मिला है। लेकिन, अब उस दीपू चंद्र दास को कौन जीवित कर सकेगा, जिसे भीड़ ने पीटकर मार दिया और फिर पेड़ से लटकाकर उसे जला दिया। आखिर उस बेगुनाह के जीवन को कौन वापस ला सकेगा!

समाचार एजेंसियों की मानें तो हिन्दू युवक दीपू चंद्र दास की भीड़ द्वारा हत्या के मामले में दो और लोगों को गिरफ्तार किया गया है और अब इस मामले में गिरफ्तार आरोपियों की संख्या बारह हो गई है। मैमनसिंह के अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक अब्दुल अल मामून द्वारा रविवार को गिरफ्तार किए गए दोनों युवकों की पहचान पच्चीस वर्षीय आशिक और पच्चीस वर्षीय क्यूम के रूप में की गई है। अब बंगलादेश कानून के मुताबिक इन आरोपियों को क्या सजा दी जाएगी, इसका अनुमान तो अभी से नहीं लगाया जा सकता है।

वैसे, इस जघन्य अपराध की सजा तो कठोरतम ही होनी चाहिए। निर्णय तो अदालत में साक्ष्यों के ही आधार पर ही किया जाएगा, लेकिन जांच से जो बात सामने आई है उससे तो यही लगता है कि निरपराध दीपू चंद्र दास की हत्या उन्मादी भीड़ द्वारा बहकावे में आकर की गई है।

ईशनिंदा कानून ऐसे कानून होते हैं जो किसी धर्म, उसके प्रतीकों, पवित्र वस्तुओं या धार्मिक भावनाओं का जानबूझकर अपमान, अवमानना या मज़ाक उड़ाने को गैरकानूनी मानते हैं, जिसके लिए विभिन्न देशों में अलग-अलग सज़ाएं (जुर्माने से लेकर मौत तक) तय हैं, और ये कानून अक्सर धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ इस्तेमाल होने या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सीमित करने के आरोपों का सामना करते हैं, हालांकि भारत में बीएनएस की धारा 295ए के तहत धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने पर सज़ा का प्रावधान है, न कि अलग से ईशनिंदा कानून। यह ईश्वर, धर्म, धार्मिक भावनाओं, प्रतीकों या पवित्र वस्तुओं के प्रति अनादर, अपमान या अवमानना दिखाने वाले कार्यों या बयानों को दंडित करता है।

इसके तहत किसी धार्मिक स्थल को नुकसान पहुंचाना, धार्मिक सभाओं में बाधा डालना या धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाले भाषण, लेखन या दृश्य शामिल हो सकते हैं। पाकिस्तान, ईरान जैसे देशों में इसके तहत मौत की सज़ा का प्रावधान है और अक्सर अल्पसंख्यकों के खिलाफ इसके दुरुपयोग के आरोप लगते रहे हैं। भारत में कोई अलग ईशनिंदा कानून नहीं है, लेकिन भारतीय न्याय संहिता(बीएनएस) की धारा 295ए के तहत, जानबूझकर और दुर्भावनापूर्ण इरादे से किसी वर्ग की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाना या उनके धर्म का अपमान करना दंडनीय अपराध है, जिसकी सज़ा तीन साल तक की कैद और जुर्माना हो सकती है। कई पश्चिमी देशों में ऐसे कानून या तो खत्म हो गए हैं (जैसे अमेरिका में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के कारण) या केवल अपमानजनक भाषणों को प्रतिबंधित करते हैं, न कि आलोचना को।

बांग्लादेश में ईशनिंदा के लिए कोई विशिष्ट ‘ईशनिंदा कानून’ नहीं है, बल्कि यह दंड संहिता की धारा 295(ए) जैसे प्रावधानों के तहत आता है, जो किसी भी धर्म की ‘धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने’ के लिए सज़ा का प्रावधान करता है, जिसमें कारावास या जुर्माना हो सकता है, हालांकि इस्लामी कट्टरपंथियों द्वारा मौत की सज़ा की मांग की जाती है, लेकिन इसे अस्वीकार किया है और देश को धर्मनिरपेक्ष बताते हुए कहा है कि मौजूदा कानून पर्याप्त हैं। धारा 295ए जानबूझकर और दुर्भावनापूर्ण कृत्यों के लिए दंड का प्रावधान करती है, जिनका उद्देश्य किसी भी वर्ग की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाना या उनके धर्म या धार्मिक मान्यताओं का अपमान करना होता है, जिसमें जेल की सज़ा हो सकती है।

डिजिटल सुरक्षा कानून के जरिये सरकार इसका उपयोग ईशनिंदा सामग्री को सेंसर करने और ऑनलाइन घृणास्पद भाषण को नियंत्रित करने के लिए करती है, जिससे गिरफ्तारी और सजा हो सकती है । ईशनिंदा से जुड़े मामलों में सजा की गंभीरता अपराध की प्रकृति और न्यायाधीश के विवेक पर निर्भर करती है, जिसमें कारावास (इंप्रिजमेंट) और जुर्माना (फाइन) शामिल है, लेकिन मौत की सज़ा का प्रावधान नहीं है, जैसा कि कट्टरपंथी मांग करते हैं। बांग्लादेश इस्लामिक है, लेकिन देश में ब्रिटिश काल से धर्मनिरपेक्ष दंड संहिता भी लागू है। सरकार का कहना है कि धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने के खिलाफ कानून मौजूद हैं और वे सभी धर्मों के अनुयायियों के अधिकारों की रक्षा करते हैं। संक्षेप में, बांग्लादेश में ईशनिंदा के लिए कोई अलग से कानून नहीं है, बल्कि दंड संहिता की धारा 295(ए) और अन्य कानूनों (जैसे डिजिटल सुरक्षा कानून) का उपयोग किया जाता है, जिसमें कारावास की सज़ा और जुर्माना हो सकता है।

ऐसी स्थिति में जब की बांग्लादेश में ईशनिंदा के लिए दंड संहिता  की धारा 295ए ही लागू है, तो फिर ऐसे उन्मादी भीड़ को क्या वहां की न्यायपालिका कठोर दंड दे सकने में सक्षम है? यदि वहां सक्षम और समर्थ न्याय की संभावना है, तो फिर हत्या के इस मामले की जल्द से जल्द जांच करके अपराधियों को कड़ी से कड़ी सजा दी जानी चाहिए। लेकिन, आशंका इस बात की भी हैकि कहीं महज इसकी कागजी खानापूर्ति करके मामले को दाखिलदफ्तर न कर दिया जाए। ऐसा नकारात्मक विचार इसलिए भी आता है कि जिस बांग्लादेश के निर्माण के लिए सर्वाधिक भागीदार भारत ही रहा है, तो वहां पर अल्पसंख्यक हिंदुओं को दीपू चंद्र दास की तरह पीटकर मार देने के बाद पेड़ पर लटकाकर जला दिया जाए, इस तरह का अमानवीय कृत्य शायद ही विश्व में स्वीकार्य हो सकता है।

अतः इसके लिए आवश्यक है कि जो भी अल्पसंख्यक दीपू चंद्र दास की हत्या के लिए अपराधी हों, उन्हें कठोर से कठोर सजा दी जाए, अन्यथा इस तरह के उन्मादी कम होने के बदले बढ़ते ही रहेंगे, जिसका परिणाम किसी भी दशा में सकारात्मक नहीं होगा। हालांकि, भारतीय विदेश मंत्रालय ने इस मुद्दे पर पहली बार बयान दिया और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा को लेकर चिंता जताई है। भारत ने बांग्लादेश की जटिल होती स्थिति पर कड़ी नजर रखने की बात दोहराई है तथा अफसरों के साथ संपर्क में रहकर अल्पसंख्यकों पर हमले रोकने के प्रयासों पर बल दिया है। लेकिन, देखने की बात होगी कि इसका असर कितना हो पाता है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं)

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