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Jamshedpur : यूजीसी बिल पर बेवजह हाय तौबा क्यों : कुलबिंदर

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फतेह लाइव, रिपोर्टर. 

जमशेदपुर के पूर्व कार्यकारी प्रधानाध्यापक एवं अधिवक्ता कुलबिंदर सिंह ने यूजीसी बिल के प्रावधान समता कमेटी को लेकर हाय तौबा करने वालों पर सवाल उठाते हुए कहा है कि क्या उन्हें देश के संविधान एवं न्यायिक व्यवस्था में भरोसा नहीं है?

क्या स्वर्ण जाति के लोग इस धारणा को मजबूत करना चाहते हैं कि देश के भौतिक संसाधन एवं रोजी रोजगार तथा शिक्षा के अवसर पर अगड़ी जातियों का कब्जा है? वे अन्य भारतीयों को अपने समकक्ष खड़े होने देने के फैसले के खिलाफ हैं?

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इस अधिवक्ता के अनुसार स्वर्ण जाति के लोग यूजीसी बिल का जितना विरोध करेंगे, उतना ही यह धारणा मजबूत होगी कि वे रूढ़िवादी हैं और अन्य पिछड़ा वर्ग, अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति वर्ग को देश के सार्वजनिक संसाधन, रोजगार एवं शिक्षा का समानता का अवसर और अधिकार देना ही नहीं चाहते हैं।

अगड़े यह भी जान लें कि केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार एवं यूजीसी ने अन्य पिछड़ा वर्ग अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के हित रक्षा के लिए बड़े शौक से यह फैसला नहीं लिया है, जिस तरह से ईडब्ल्यूसी पर अगड़ी जातियों को 10% आरक्षण रोजगार एवं शिक्षा में दिया है।

अमित कुमार बनाम भारत संघ में सर्वोच्च न्यायालय ने एनसीआरबी के आंकड़े तथा नेशनल टास्क फोर्स के अनुशंसा पर ही समता कमेटी को कारगर बनाने का आदेश केंद्र सरकार एवं यूजीसी को दिया।
क्या स्वर्ण जाति इस बात से अनभिज्ञ है कि 2014 से 2021 तक आईआईटी, आईआईएम इंडियन इंस्टीट्यूट आफ साइंस बेंगलुरु जैसे अंतरराष्ट्रीय स्तर के विख्यात संस्थानों में अनुसूचित जनजाति के तीन अनुसूचित जाति के 24 अन्य पिछड़ा वर्ग के 41 अल्पसंख्यक के तीन विद्यार्थियों ने जातिगत भेदभाव के कारण आत्महत्या की।

केंद्रीय विश्वविद्यालय में 37 एवं एनआईटी में 30 बच्चों ने आत्महत्या की। पूरा देश जानता है कितनी कड़ी मेहनत मशक्कत के बाद इन संस्थानों में बच्चों को नामांकन मिलता है। वहां छात्रों को तो छोड़ दीजिए, कुछ शिक्षकों के जातिगत टिप्पणी के कारण आत्महत्या की घटनाएं हुई हैं।

अधिवक्ता कुलबिंदर सिंह के अनुसार यूजीसी बिल का विरोध करने की बजाय उच्च संस्थानों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों को जातिगत उत्पीड़न करने से बचने बचाने की सलाह उनके अभिभावकों द्वारा देनी चाहिए।
वैसे भी अगड़ों के बच्चों के पास सदियों के शील, परोपकार और सहअस्तित्व संस्कार की समृद्ध विरासत है और उन्हें इस पर चलने को प्रेरित किया जाना चाहिए नाकि आग में पेट्रोल डालने जैसा काम करना चाहिए? अगड़ी वर्ग के लोगों को जातिगत सोच से ऊपर राष्ट्रीय सोच रखनी चाहिए।

भारत में जातिगत उत्पीड़न यथार्थ है और यह ऐतिहासिक एवं सामाजिक सत्य है, केंद्र सरकार ने इसके तोड़ने का फैसला लेकर सराहनीय कार्य किया है। सदियों से अपेक्षित, उत्पीड़ित एवं शोषित वर्ग को न्याय मिलने की उम्मीद जगी है क्योंकि शिकायत मिलने के 24 घंटे के अंदर समिति की बैठक का आयोजन एवं 15 दिन में रिपोर्ट तथा सात दिन के अंदर कार्रवाई अवश्य करनी होगी।

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