- टाटानगर में 26 साल से जमे कर्मचारी की फिर से सीनियर डीसीएम ने कि ‘गुड्स’ में पोस्टिंग, मुंह ताकता रह गया विजिलेंस
फतेह लाइव रिपोर्टर
चक्रधरपुर/जमशेदपुर. दक्षिण पूर्व रेलवे के चक्रधरपुर रेल मंडल में रेलवे बोर्ड के नियम-कानून कागजी पुलिंदे साबित हो रहे हैं. पारदर्शिता और निष्पक्षता बनाए रखने के लिए रेलवे बोर्ड द्वारा संवेदनशील (सेंसिटिव) पदों पर तबादलों को लेकर जारी सख्त दिशानिर्देशों की सरेआम धज्जियां उड़ाई जा रही हैं. मंडल रेल प्रबंधकीय तंत्र और कमर्शियल विभाग के शीर्ष अधिकारियों की ‘विशेष कृपा’ के आगे रेलवे के अपने नियम भी बेबस नजर आ रहे हैं.
ताजा और सबसे चर्चित मामला टाटानगर में अमित चौधरी को ‘गुड्स का प्रभारी’ (In-charge of Goods) बनाए जाने का है. रेलवे बोर्ड के सर्कुलर के अनुसार, संवेदनशील पदों पर किसी भी कर्मचारी या अधिकारी को एक निश्चित समय सीमा से अधिक समय तक बनाए नहीं रखा जा सकता, ताकि किसी भी प्रकार की अनियमितता या भ्रष्टाचार की गुंजाइश न रहे. लेकिन टाटानगर जैसे अति-संवेदनशील और राजस्व देने वाले स्टेशन पर नियमों को दरकिनार कर मनचाही पोस्टिंग का खेल खुलेआम जारी है.
विजिलेंस की रेड का मोल केवल 3 महीने?
इस पूरे घटनाक्रम ने रेलवे के विजिलेंस (सतर्कता) विभाग की साख पर भी गहरा सवालिया निशान लगा दिया है. हाल ही में विजिलेंस की अनुशंसनात्मक रिपोर्ट और लंबे समय से एक स्थान पर जमे लगभग एक दर्जन कर्मचारियों को संवेदनशील पदों से हटाकर साइडलाइन किया गया था. परंतु चक्रधरपुर मंडल में ऐसा ‘चमत्कार’ हुआ कि महज तीन महीने के भीतर ही उन तमाम चेहरों को दोबारा उन्हीं मलाईदार कुर्सियों पर काबिज कर दिया गया.
अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या विजिलेंस की जांच और रिपोर्ट का मोल सिर्फ तीन महीने का ‘मिनी ब्रेक’ बनकर रह गया है? जब हटाए गए कर्मचारियों को बिना किसी ठोस वजह के दोबारा वही जिम्मेदारियां सौंप दी जाती हैं, तो विजिलेंस जैसी संस्था की प्रासंगिकता ही समाप्त हो जाती है.
मुख्यालय की ‘रहस्यमयी’ खामोशी
हैरानी की बात यह है कि चक्रधरपुर मंडल में चल रहे इस मनमाने रवैये पर दक्षिण पूर्व रेलवे (SER) मुख्यालय ‘गार्डन रीच’ के वरिष्ठ अधिकारी पूरी तरह मौन हैं. SDGM जिनकी अनुशंसाओं को दरकिनार कर दागी कर्मियों की वापसी कराई गई, वे इस अवहेलना पर खामोश हैं. वहीं PCCM (वाणिज्य प्रमुख) भी कमर्शियल विभाग में नियमों की इस अनदेखी पर चुप्पी साधे हुए हैं. दिलचस्प है लगातार सामने आ रही सूचनाओं के बावजूद जोन के सर्वेसर्वा जीएम भी पारदर्शी ट्रांसफर पॉलिसी के उल्लंघन को रोकने में नाकाम दिख रहे हैं.
यदि चक्रधरपुर और टाटानगर में इसी तरह रेलवे बोर्ड के निर्देशों को ठेंगा दिखाया जाता रहा, तो आम कर्मचारियों के बीच नियमों के प्रति विश्वास पूरी तरह खत्म हो जाएगा. अब देखना होगा कि रेल मंत्रालय इस ‘विशेष मेहरबानी’ पर संज्ञान लेता है या यह खेल यूं ही जारी रहेगा.










