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Gamharia Rape Case : थाने में ही लुट गई इंसाफ की आस !

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गम्हरिया की घटना ने पुलिसिंग की बुनियाद पर खड़े किए गंभीर सवाल

थानों को भयमुक्त, जवाबदेह और संवेदनशील बनाने के लिए अब पुराने तौर-तरीकों से आगे बढ़ना होगा

आनंद सिंह।

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आम आदमी जब किसी मुसीबत में फंसता है, उसके साथ अन्याय होता है अथवा उसे किसी तरह की प्रताड़ना झेलनी पड़ती है, तो वह सबसे पहले थाने का दरवाजा खटखटाता है। उसके मन में एक सहज विश्वास होता है कि कानून के रखवाले उसकी बात सुनेंगे, उसकी पीड़ा समझेंगे और उसे न्याय दिलाने की दिशा में पहल करेंगे। पुलिस व्यवस्था से उसकी अपेक्षा बहुत बड़ी नहीं होती। वह केवल इतना चाहता है कि उसकी फरियाद सुनी जाए, उसके साथ सम्मानजनक व्यवहार हो और कानून के मुताबिक कार्रवाई की जाए।

यह भी सच है कि पुलिस व्यवस्था में भ्रष्टाचार, पक्षपात, राजनीतिक दबाव और संवेदनहीनता की शिकायतें नई नहीं हैं। कई बार फरियादी थाने पहुंचता है, लेकिन उसकी समस्या का समाधान होने के बजाय वह नई परेशानियों में घिर जाता है। कहीं प्राथमिकी दर्ज कराने के लिए मशक्कत करनी पड़ती है, कहीं प्रभावशाली लोगों के दबाव में कार्रवाई प्रभावित होती है, तो कहीं पुलिसकर्मियों का व्यवहार ही पीड़ित के लिए दूसरी यातना बन जाता है। इसके बावजूद आम आदमी थाने जाता है, क्योंकि उपलब्ध संस्थागत व्यवस्था में पुलिस ही वह पहली कड़ी है, जहां से उसे न्यायिक प्रक्रिया तक पहुंचने का रास्ता मिलता है।

लेकिन जरा ठहरकर सोचिए। यदि कोई महिला न्याय की आस लेकर थाने पहुंचे और वहीं उसके साथ दुष्कर्म जैसी जघन्य वारदात हो जाए तो इस स्थिति को क्या कहा जाएगा? जिस संस्थान से उसे सुरक्षा और न्याय की उम्मीद थी, यदि उसी की चारदीवारी में उसकी गरिमा और सुरक्षा खतरे में पड़ जाए तो उसके लिए न्याय व्यवस्था पर भरोसा बचा कैसे रहेगा?

झारखंड के सरायकेला-खरसावां जिले के गम्हरिया थाने से सामने आया मामला इसी वजह से असाधारण रूप से गंभीर है। एक महिला न्याय की उम्मीद लेकर थाने पहुंची थी। आरोप है कि वहां उसके साथ दुष्कर्म किया गया। इस मामले में थाना प्रभारी समेत अब तक 15 लोगों के विरुद्ध कार्रवाई की खबर सामने आई है। आरोपों की जांच और दोषियों की कानूनी जवाबदेही अपनी जगह है, लेकिन इस पूरे प्रकरण ने पुलिसिंग की कार्यप्रणाली को लेकर ऐसे सवाल खड़े कर दिए हैं, जिनसे मुंह नहीं मोड़ा जा सकता।

यह महज एक आपराधिक घटना नहीं है। यह उस भरोसे पर हमला है, जिसके आधार पर आम नागरिक पुलिस व्यवस्था के पास जाता है। किसी अपराधी से अपनी सुरक्षा की उम्मीद करना एक बात है, लेकिन यदि सुरक्षा देने वाले संस्थान के भीतर ही अपराध का आरोप सामने आए तो यह पूरे तंत्र के लिए आत्ममंथन का विषय बन जाता है।

थाने में फरियादी की सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी?

इस घटना का सबसे महत्वपूर्ण पहलू पुलिस थाने के भीतर फरियादियों की सुरक्षा और उनके साथ होने वाले व्यवहार से जुड़ा है। आखिर किसी थाने में आने वाले फरियादी की जिम्मेदारी किसकी होती है? उसकी शिकायत सुनने, उसे उचित अधिकारी तक पहुंचाने और उसकी सुरक्षा सुनिश्चित करने का दायित्व किस पुलिसकर्मी का है?

थाने में आने वाला प्रत्येक व्यक्ति किसी न किसी परेशानी से गुजर रहा होता है। वह मानसिक रूप से परेशान, भयभीत अथवा असहाय हो सकता है। विशेषकर महिला फरियादी की स्थिति और भी संवेदनशील होती है। ऐसे में यह सुनिश्चित करना थाने के प्रभारी और वहां तैनात पूरी टीम की जिम्मेदारी है कि कोई भी अनधिकृत व्यक्ति उसके संपर्क में न आए और उसके साथ किसी तरह की अभद्रता या उत्पीड़न न हो।

गम्हरिया प्रकरण में वायरलेस ऑपरेटर की भूमिका को लेकर जो सवाल उठे हैं, वे भी कम महत्वपूर्ण नहीं हैं। एक वायरलेस ऑपरेटर का मूल काम संचार व्यवस्था को संचालित करना है। फिर वह फरियादी महिला के संपर्क में किस परिस्थिति में पहुंचा? क्या उसकी भूमिका और अधिकारों की स्पष्ट सीमा निर्धारित थी? क्या थाने में फरियादियों तक पहुंचने और उनसे बातचीत करने की कोई निगरानी व्यवस्था थी? क्या थाने में आने-जाने वाले लोगों और पुलिसकर्मियों की गतिविधियों का कोई प्रभावी रिकॉर्ड रखा जाता था?

ये ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब केवल विभागीय जांच की औपचारिकता से नहीं मिलना चाहिए। पुलिस के शीर्ष अधिकारियों को यह देखना होगा कि कहीं थानों की आंतरिक कार्यप्रणाली में ऐसी खामियां तो नहीं हैं, जिनका फायदा उठाकर कोई कर्मचारी अपनी सीमाओं का उल्लंघन कर सकता है।

किसी व्यक्ति की कथित आपराधिक मानसिकता को केवल नियुक्ति के समय पहचान लेना संभव नहीं है। लेकिन ऐसी परिस्थितियां जरूर बनाई जा सकती हैं, जिनमें किसी कर्मचारी के लिए अपने पद और अधिकारों का दुरुपयोग करना आसान न हो। यही संस्थागत नियंत्रण और जवाबदेही का वास्तविक अर्थ है।

व्यवस्था में छेद नहीं, मानो पूरी दीवार ही कमजोर है

पुलिस विभाग में भ्रष्टाचार, अवैध वसूली, राजनीतिक हस्तक्षेप और प्रभावशाली लोगों के प्रति नरम रवैये की शिकायतें समय-समय पर सामने आती रहती हैं। इनमें से कई शिकायतें जांच में सही भी साबित होती हैं। लेकिन इन सबके बावजूद पुलिस व्यवस्था की सामाजिक उपयोगिता और आवश्यकता को नकारा नहीं जा सकता।

लोकतांत्रिक व्यवस्था में पुलिस कानून-व्यवस्था बनाए रखने वाली संस्था भर नहीं है। वह नागरिकों के जीवन, स्वतंत्रता और गरिमा की रक्षा करने वाली पहली संस्थागत सुरक्षा पंक्ति है। अपराध की शिकायत दर्ज करना, साक्ष्य जुटाना, पीड़ित को संरक्षण देना और कानून के तहत आगे की कार्रवाई करना उसकी बुनियादी जिम्मेदारियों में शामिल है।

ऐसे में यदि थाने के भीतर ही फरियादी की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं हो पाती तो समस्या किसी एक कर्मचारी तक सीमित नहीं रह जाती। वह संस्थागत निगरानी, नेतृत्व, अनुशासन और जवाबदेही की समस्या बन जाती है।

हम यह मानकर नहीं चल सकते कि किसी एक कर्मचारी को निलंबित कर देने अथवा कुछ अधिकारियों पर कार्रवाई कर देने से पूरा मामला समाप्त हो जाएगा। कार्रवाई जरूरी है, लेकिन उससे भी जरूरी है यह पता लगाना कि ऐसी स्थिति पैदा ही क्यों हुई? किस स्तर पर चूक हुई? किसकी जिम्मेदारी थी? क्या पहले भी ऐसी शिकायतें आई थीं? क्या थाने की आंतरिक निगरानी व्यवस्था प्रभावी थी?

यदि व्यवस्था में केवल एक छेद होता तो उसे आसानी से भरा जा सकता था। लेकिन जब फरियादी की सुरक्षा से लेकर कर्मचारियों की भूमिका और अधिकारियों की निगरानी तक सवाल उठने लगें तो समझना चाहिए कि समस्या कहीं अधिक गहरी है।

पुलिसिंग का नया ट्रैक : थानों को सेवा केंद्र बनाना होगा

अब समय आ गया है कि पुलिसिंग को केवल अपराध नियंत्रण, गिरफ्तारी और कानून-व्यवस्था के पारंपरिक नजरिये से देखने के बजाय नागरिक सेवा और जवाबदेही के व्यापक ढांचे में रखा जाए। थाने को ऐसा स्थान बनाना होगा जहां फरियादी भय लेकर नहीं, भरोसा लेकर पहुंचे।

इसके लिए कुछ बुनियादी बदलाव स्थानीय स्तर पर ही किए जा सकते हैं। इनके लिए केंद्र सरकार अथवा किसी बड़े नीतिगत बदलाव की प्रतीक्षा करने की आवश्यकता नहीं है।

प्रत्येक थाने में फरियादी सहायता डेस्क हो

थाने में प्रवेश करते ही फरियादी को यह पता होना चाहिए कि उसे अपनी शिकायत किसके पास दर्ज करानी है। इसके लिए प्रशिक्षित पुलिसकर्मियों की एक अलग सहायता डेस्क हो। महिला, बुजुर्ग, दिव्यांग और बच्चों से संबंधित शिकायतों के लिए विशेष संवेदनशीलता बरती जाए। सहायता डेस्क पर तैनात कर्मियों की जिम्मेदारी तय हो और उनकी ड्यूटी का नियमित निरीक्षण किया जाए।

महिला फरियादियों के लिए सुरक्षित व्यवस्था अनिवार्य हो

महिला शिकायतकर्ता से बातचीत और उसकी शिकायत दर्ज करने की प्रक्रिया महिला पुलिसकर्मी की उपस्थिति में होनी चाहिए, जहां कानून इसकी अपेक्षा करता है। महिला फरियादी को अनावश्यक रूप से थाने में बैठाकर न रखा जाए। आवश्यकता पड़ने पर अलग सुरक्षित कक्ष उपलब्ध कराया जाए। किसी भी अनधिकृत कर्मचारी को उससे एकांत में मिलने या बातचीत करने की छूट नहीं होनी चाहिए।

थानों के भीतर सीसीटीवी निगरानी प्रभावी बनाई जाए

थाने के प्रवेश द्वार, स्वागत कक्ष, शिकायत सहायता डेस्क और सार्वजनिक आवागमन वाले हिस्सों में सीसीटीवी कैमरे अनिवार्य रूप से काम करने चाहिए। रिकॉर्डिंग सुरक्षित रखी जाए और उसकी नियमित जांच हो। साथ ही महिलाओं की निजता, गरिमा और कानूनी अधिकारों की रक्षा के लिए संवेदनशील स्थानों पर कैमरों की स्थापना और रिकॉर्डिंग के उपयोग में निर्धारित कानूनी मानकों का पालन किया जाए। कैमरे केवल दीवारों पर शोपीस बनकर न रहें, बल्कि निगरानी का वास्तविक माध्यम बनें।

हर शिकायत का डिजिटल रिकॉर्ड और ट्रैकिंग नंबर हो

थाने में पहुंचने वाले प्रत्येक फरियादी को उसकी शिकायत का एक पावती नंबर दिया जाए। शिकायत कब आई, किस अधिकारी को सौंपी गई और उस पर क्या कार्रवाई हुई, इसका डिजिटल रिकॉर्ड रखा जाए। इससे फरियादी अपनी शिकायत की स्थिति जान सकेगा और अधिकारी भी जवाबदेही से बच नहीं पाएंगे।

पांचवां, पुलिसकर्मियों के कार्यक्षेत्र और अधिकार स्पष्ट हों

थाने में तैनात प्रत्येक पुलिसकर्मी की भूमिका और जिम्मेदारी निर्धारित होनी चाहिए। वायरलेस ऑपरेटर का काम संचार व्यवस्था देखना है तो उसे उसी कार्य तक सीमित रखा जाए। फरियादियों से बातचीत, शिकायतों का निस्तारण और महिला सुरक्षा से संबंधित जिम्मेदारियां प्रशिक्षित एवं अधिकृत पुलिसकर्मियों को सौंपी जाएं। किसी भी कर्मचारी को अपने पद की सीमा लांघने की छूट नहीं मिलनी चाहिए।

थाने की जवाबदेही केवल थाना प्रभारी तक सीमित न रहे

थाने में होने वाली प्रत्येक गंभीर चूक की जिम्मेदारी तय करने के लिए एक स्पष्ट निगरानी तंत्र होना चाहिए। अनुमंडल और जिला स्तर के वरिष्ठ अधिकारी नियमित रूप से थानों का निरीक्षण करें। महिला फरियादियों की शिकायतों, लंबित मामलों और पुलिसकर्मियों के व्यवहार की समीक्षा भी निरीक्षण का हिस्सा बने। औचक निरीक्षण की व्यवस्था प्रभावी हो।

 पुलिसकर्मियों को संवेदनशीलता का नियमित प्रशिक्षण मिले

पुलिस की वर्दी अधिकार का प्रतीक है, लेकिन उस अधिकार का इस्तेमाल नागरिकों के सम्मान और सुरक्षा के लिए होना चाहिए। पुलिसकर्मियों को महिला अधिकार, लैंगिक संवेदनशीलता, मानवाधिकार, पीड़ितों से संवाद और मनोवैज्ञानिक व्यवहार का नियमित प्रशिक्षण दिया जाए। प्रशिक्षण केवल औपचारिक उपस्थिति तक सीमित न रहे, बल्कि व्यवहार में उसका असर भी दिखाई दे।

थानों का सामाजिक ऑडिट हो

पुलिस व्यवस्था की समीक्षा केवल विभागीय फाइलों और अपराध के आंकड़ों के आधार पर नहीं होनी चाहिए। आम नागरिकों, स्थानीय जनप्रतिनिधियों, अधिवक्ताओं और नागरिक समाज के प्रतिनिधियों से भी समय-समय पर फीडबैक लिया जाए। हालांकि शिकायतकर्ताओं की पहचान और गोपनीयता पूरी तरह सुरक्षित रखी जानी चाहिए। इससे पुलिस और जनता के बीच संवाद का एक नया रास्ता खुलेगा।

शिकायतों के लिए स्वतंत्र और सुलभ व्यवस्था हो

यदि किसी फरियादी को थाने में ही पुलिसकर्मी के खिलाफ शिकायत करनी हो तो उसके पास थाने से बाहर भी प्रभावी विकल्प होना चाहिए। जिला पुलिस शिकायत प्राधिकरण और राज्य पुलिस शिकायत प्राधिकरण जैसी व्यवस्थाओं को प्रभावी बनाया जाए। शिकायत की निष्पक्ष जांच हो और शिकायतकर्ता को यह भरोसा मिले कि आरोपी पुलिसकर्मी के प्रभाव से जांच प्रभावित नहीं होगी।

पीड़ित को न्यायिक प्रक्रिया के दौरान भी संरक्षण मिले

किसी महिला के साथ अपराध होने के बाद उसकी जिम्मेदारी केवल प्राथमिकी दर्ज करने तक समाप्त नहीं हो जाती। उसे चिकित्सकीय सहायता, कानूनी परामर्श, मनोवैज्ञानिक सहयोग, सुरक्षा और जांच की प्रगति की जानकारी उपलब्ध कराना भी जरूरी है। पीड़ित को बार-बार अपनी पीड़ा दोहराने के लिए विवश न किया जाए। उसकी गरिमा और निजता को सर्वोच्च प्राथमिकता मिले।

पुलिस विभाग अक्सर अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई, गिरफ्तारी और उपलब्धियों का ब्यौरा सार्वजनिक करता है। यह जरूरी भी है। लेकिन पुलिस की असली प्रतिष्ठा इस बात से तय होती है कि आम आदमी उसके पास पहुंचकर कैसा अनुभव लेकर लौटता है।

क्या उसकी बात सुनी गई? क्या उसे अपमानित किया गया या सम्मान मिला? क्या उसकी शिकायत दर्ज हुई? क्या उसे अनावश्यक रूप से दौड़ाया गया? क्या उसे किसी प्रभावशाली व्यक्ति के दबाव में समझौता करने के लिए मजबूर किया गया? और सबसे महत्वपूर्ण, क्या वह थाने से सुरक्षित होकर लौटा?पुलिसिंग की सफलता का आकलन इन सवालों से भी होना चाहिए।

थाने का वातावरण ऐसा होना चाहिए जहां एक गरीब व्यक्ति और एक प्रभावशाली व्यक्ति के साथ समान व्यवहार हो। किसी महिला को अपनी शिकायत दर्ज कराने के लिए किसी की सिफारिश की जरूरत न पड़े। किसी कमजोर व्यक्ति को यह न लगे कि उसकी बात सुनने वाला कोई नहीं है। पुलिस की वर्दी आम आदमी के लिए भरोसे का प्रतीक बने, भय का नहीं।

गम्हरिया की घटना ने झारखंड पुलिस की छवि पर गहरा प्रश्नचिह्न लगा दिया है। इस धब्बे को मिटाना आसान नहीं होगा। विभागीय कार्रवाई से तत्काल संदेश जरूर जाएगा, लेकिन जनता का भरोसा बहाल करने के लिए उससे कहीं अधिक प्रयास करने होंगे।

इस मामले में निष्पक्ष और समयबद्ध जांच होनी चाहिए। जिन लोगों पर आरोप हैं, उनके विरुद्ध साक्ष्यों के आधार पर कठोर कानूनी कार्रवाई हो। किसी भी स्तर पर पद, प्रभाव या विभागीय संरक्षण को ढाल न बनने दिया जाए। साथ ही पीड़ित महिला को न्याय दिलाने की प्रक्रिया में उसकी सुरक्षा, सम्मान और मानसिक स्थिति का विशेष ध्यान रखा जाए।

झारखंड पुलिस के शीर्ष अधिकारियों को इस घटना को एक सामान्य आपराधिक प्रकरण मानकर आगे नहीं बढ़ जाना चाहिए। इसे पुलिसिंग की आंतरिक व्यवस्था की व्यापक समीक्षा का अवसर बनाना चाहिए। राज्य के सभी थानों की कार्यप्रणाली, महिला सुरक्षा प्रोटोकॉल, सीसीटीवी निगरानी, शिकायत पंजीकरण और पुलिसकर्मियों की जवाबदेही की समीक्षा होनी चाहिए।

यहां एक बात और समझने की जरूरत है। पुलिस व्यवस्था में सुधार का मतलब केवल अधिक संसाधन, नई गाड़ियां, आधुनिक हथियार और तकनीकी उपकरण नहीं है। तकनीक तभी उपयोगी है जब उसके पीछे मानवीय संवेदना और जवाबदेह कार्यसंस्कृति हो। जिस थाने में फरियादी की बात सुनने वाला कोई संवेदनशील अधिकारी नहीं है, वहां महंगे उपकरण भी भरोसे का निर्माण नहीं कर सकते।

पुलिस की वर्दी केवल अधिकार नहीं, एक बड़ी जिम्मेदारी भी है। उस वर्दी को पहनने वाले प्रत्येक व्यक्ति को यह समझना होगा कि थाने की चौखट पर पहुंचने वाला नागरिक उसके सामने कोई उपकार मांगने नहीं आया है। वह अपने संवैधानिक अधिकार के तहत न्याय और सुरक्षा की अपेक्षा लेकर आया है।

गम्हरिया की घटना अंतिम होनी चाहिए। यह केवल एक भावनात्मक अपील नहीं, बल्कि झारखंड पुलिस के लिए संस्थागत सुधार का संकल्प होना चाहिए। क्योंकि जिस दिन आम आदमी का थाने से भरोसा उठ जाएगा, उस दिन केवल पुलिस की प्रतिष्ठा नहीं गिरेगी, बल्कि कानून के शासन में नागरिकों का विश्वास भी कमजोर होगा।

आखिरकार, थाने की असली पहचान उसकी इमारत, हथियारों या वर्दी से नहीं होती। उसकी पहचान इस बात से होती है कि वहां न्याय मांगने आया सबसे कमजोर व्यक्ति भी कितनी सुरक्षा, गरिमा और भरोसे के साथ वापस लौटता है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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