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Jamshedpur : प्यार जरूरी है पर जान से बढ़कर नहीं : सतनाम सिंह गंभीर

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फतेह लाइव, रिपोर्टर. 

ऑल इंडिया सिख स्टूडेंट्स फेडरेशन के पूर्वी भारत अध्यक्ष सतनाम सिंह गंभीर ने कहा की सुप्रीम कोर्ट का लावारिस कुत्तों को पकड़कर आश्रयगृहों में रखने का आदेश मूल रूप से जन-जीवन की सुरक्षा को ध्यान में रखकर लिया गया है। लेकिन इस फैसले के खिलाफ जिस तरह कुछ पशुप्रेमी विरोध पर उतर आए हैं, वह एक असंतुलित दृष्टिकोण को दर्शाता है। इंसानों की सुरक्षा और गरिमा को सर्वोपरि रखना किसी भी सभ्य समाज का आधार है। दुर्भाग्य से, हम ऐसे दौर में हैं जहां कुत्तों के अधिकार पर तो खुलकर बहस होती है, लेकिन उन निर्दोष बच्चों, बुजुर्गों और राहगीरों के दर्द पर कम ध्यान दिया जाता है, जो लावारिस कुत्तों के हमलों के शिकार होते हैं।

यह सवाल केवल पशु-प्रेम या विरोध का नहीं है, बल्कि प्राथमिकताओं का है। क्या हम इंसानी जान से ऊपर किसी भी अन्य संवेदना को रख सकते हैं? निश्चित रूप से पशु-प्रेम गलत नहीं है, बल्कि सराहनीय है, लेकिन जब बात जन-सुरक्षा की हो, तो भावुकता के बजाय व्यवहारिकता जरूरी है।

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दुख की बात यह है कि जिन घरों ने अपने किसी प्रियजन को इस समस्या के कारण खोया है या जो गंभीर रूप से घायल हुए हैं, उनके दर्द को समझने की कोशिश कम ही होती है। शायद ऐसे हादसे सीधे विरोध करने वालों के अपने घरों में घटित हों, तब उन्हें अहसास हो कि लावारिस कुत्तों की समस्या कितनी गहरी और खतरनाक है।

समाज में संतुलन यही है कि इंसानों और जानवरों दोनों की भलाई सुनिश्चित की जाए, लेकिन जब एक की सुरक्षा दूसरे के अस्तित्व से खतरे में हो, तो विवेकपूर्ण और कठोर फैसले लेने से पीछे नहीं हटना चाहिए। जिंदगी एक बार मिलती है—और उसे किसी टल सकने वाली वजह से खोना सबसे बड़ा अन्याय है।

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