फतेह लाइव, रिपोर्टर.
जमशेदपुर की कानून-व्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए सरकार ने बड़ा फैसला लिया था। एक चर्चित घटना के बाद मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को स्वयं हस्तक्षेप करना पड़ा और जिले को नया एसएसपी मिला। संदेश साफ था—अपराध पर नकेल कसेगी, पुलिस जवाबदेह बनेगी और जनता की आवाज सीधे पुलिस मुख्यालय तक पहुंचेगी।
लेकिन सवाल यह है कि क्या वाकई कुछ बदला है?
सरकार ने जनता की सुविधा के लिए वरिष्ठ अधिकारियों के सरकारी मोबाइल नंबर जारी किए। उद्देश्य था कि संकट की घड़ी में आम आदमी सीधे अपनी बात रख सके। लेकिन जब जिले के पुलिस कप्तान का सरकारी मोबाइल ही जनता के लिए “अनरीचेबल व्यवस्था” बन जाए, तो फिर नीचे की व्यवस्था कैसी होगी, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है।
फ़तेह लाइव ने एसएसपी डॉ. एहतेशम वकारिब के सरकारी मोबाइल नंबर 9431706480 पर संपर्क करने का प्रयास किया। फोन रिसीव नहीं हुआ। कॉल का पूरा रिकॉर्ड सुरक्षित है। सवाल यह नहीं कि एक कॉल क्यों नहीं उठी, बल्कि सवाल यह है कि यदि किसी पीड़ित की जान-माल पर संकट हो और वह एसएसपी तक नहीं पहुंच पाए, तो उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा? इसी तरह थानेदारों के नंबर भी टांय टांय फिस है। इन नंबरो को जनता की सुविधा लिए दिया गया है। बिल भी विशेष है?
दूसरी ओर, रात्रि निरीक्षण की तस्वीरें नियमित रूप से जारी होती हैं। लेकिन क्या उन निरीक्षणों में यह भी दिखाई देता है कि बागबेड़ा और टेल्को थाना के सामने खुलेआम शराब की बिक्री की शिकायतें लगातार उठती रही हैं? अगर थाना के सामने ही कानून का मजाक उड़ता रहे, तो फिर अपराधियों के मन से पुलिस का खौफ कैसे पैदा होगा?
पुलिसिंग केवल प्रेस विज्ञप्तियों, फोटो सेशन और निरीक्षण की तस्वीरों से मजबूत नहीं होती। उसका असली पैमाना यह है कि क्या आम आदमी की आवाज पुलिस कप्तान तक पहुंच रही है? क्या सरकारी नंबर वास्तव में जनता के लिए काम कर रहे हैं?
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से सीधा सवाल है—क्या जनता के लिए जारी सरकारी नंबर सिर्फ औपचारिकता बनकर रह गए हैं? अगर जिले का एसएसपी ही जनता की कॉल का जवाब नहीं देता, तो फिर थानेदारों से जवाबदेही की उम्मीद किस आधार पर की जाए?
यह सवाल केवल एक फोन कॉल का नहीं, बल्कि पुलिस व्यवस्था की जवाबदेही, संवेदनशीलता और जनता के भरोसे का है। सरकार को इस पर गंभीरता से संज्ञान लेना चाहिए, क्योंकि जवाबदेह पुलिस ही सुशासन की सबसे बड़ी पहचान होती है।










