फतेह लाइव रिपोर्टर
जमशेदपुर के बागबेड़ा थाना अंतर्गत कानून और न्याय व्यवस्था को ठेंगा दिखाने का एक बेहद गंभीर मामला सामने आया है. स्थानीय लोगों के बीच चल रहे एक विवाद, जो वर्तमान में न्यायालय में विचाराधीन है, को ताक पर रखकर कुछ दबंग युवकों ने हरहरगु्टू बड़ा तालाब के समीप कानून को अपने हाथ में ले लिया.
शुक्रवार की शाम करीब पांच बजे कुछ शरारती तत्वों ने पोकलेन मशीन बुलाकर एक घर की दो तरफ से चहारदीवारी को पूरी तरह से क्षतिग्रस्त कर दिया. इस घटना के बाद पूरे इलाके में तनाव और दहशत का माहौल है.
थाने में शिकायत की जगह पीड़ित पर ही दबाव
सबसे हैरानी की बात यह है कि जब पीड़ित पक्ष न्याय की गुहार लगाने बागबेड़ा थाना पहुंचा, तो पुलिस ने कानून तोड़ने वाले अराजक तत्वों पर कार्रवाई करने के बजाय अघोषित रूप से उनका ही पक्ष लेना शुरू कर दिया. थाना प्रभारी प्राथमिकी दर्ज करने की जगह तरह-तरह की तकनीकी जांच व बहानेबाजी का हवाला देने लगे. इतना ही नहीं, पुलिस ने उल्टा पीड़ित पक्ष पर ही जमीन अतिक्रमण का आरोप मढ़कर उन पर मानसिक दबाव बनाना शुरू कर दिया, जिससे खाकी की कार्यप्रणाली पर गंभीर दाग लग गए हैं.
सुनियोजित साजिश के तहत दिया गया घटना को अंजाम
यह पूरा प्रकरण पूरी तरह से सुनियोजित और प्रायोजित प्रतीत होता है. घटना को अंजाम देने के लिए शुक्रवार की शाम 5 बजे के बाद का समय चुना गया, ताकि उसके ठीक बाद शनिवार और रविवार का सप्ताहांत आ जाए और इस दौरान प्रशासनिक स्तर पर कोई त्वरित कार्रवाई न हो सके.
ऐसा लगता है कि पुलिस की परोक्ष शह और मिलीभगत के कारण ही इन युवकों के हौसले इतने बुलंद थे कि उन्होंने सरेआम न्यायालय के आदेशों को धता बताते हुए इस कुकृत्य को अंजाम दे दिया. घटना के बाद तुरंत पुलिस भी पहुंच गयी लेकिन कार्रवाई करने की जगह बागबेड़ा पुलिस और थाना प्रभारी पूरे मामले में लीपापोती करने और अपराधियों के गुनाह पर पर्दा डालने के ही प्रयास में जुटे हैं.
पुलिस ने अवैध कृत्य में संलग्न पोकलेन को भी जाने दिया.
पुलिस की भूमिका पर खड़े होते गंभीर सवाल
पूरी घटना ने स्थानीय पुलिस प्रशासन की कार्यशैली को कटघरे में खड़ा कर दिया है.
- न्यायालय की अवमानना: जब मामला पहले से ही कोर्ट में विचाराधीन है, तब पुलिस और आरोपियों द्वारा इस तरह विवादित स्थल पर हस्तक्षेप करना और तोड़फोड़ करना सीधे तौर पर अदालत की अवमानना है.
- कार्रवाई से दूरी और लीपापोती: घटना के बाद पोकलेन मशीन को मौके से जब्त करने के बावजूद उसे चुपचाप जाने दिया जाना पुलिस की मिलीभगत को स्पष्ट रूप से उजागर करता है.
- अपराधियों को संरक्षण: कानून अपने हाथ में लेने वालों पर सख्त कानूनी कार्रवाई करने के बजाय थाना प्रभारी द्वारा उनका पक्ष लेना और पीड़ित पक्ष को ही डराना-धमकाना पुलिस के भ्रष्ट रवैये को दर्शाता है.
- छुट्टियों का फायदा उठाने की साजिश: शुक्रवार की शाम को घटना को अंजाम दिलवाना ताकि सप्ताहांत की आड़ में मामला ठंडे बस्ते में चला जाए, एक गहरी साजिश की ओर इशारा करता है.
एसएसपी की सख्ती के बीच थाना प्रभारी की बेलगाम कार्यप्रणाली
एक तरफ जहां जिले के एसएसपी (SSP) शहर में कानून का राज कायम करने और अपराध पर नकेल कसने के लिए लगातार कड़े कदम उठा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ कर्तव्यहीनता और अनियमितता के आरोप में कई थानेदारों पर गाज भी गिर चुकी है. इसके बावजूद बागबेड़ा थाना प्रभारी का इस तरह अपराधियों को खुली छूट देना और उनकी शह पर कानून व्यवस्था को तार-तार करना प्रशासनिक व्यवस्था के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है. आम जनता अब यह सवाल पूछने पर मजबूर है कि क्या पुलिस महकमे में कुछ अधिकारियों को कानून से ऊपर छूट मिली हुई है?
बागबेड़ा में रात होते ही नशे का शुरू हो जाता है कारोबार
इस बीच चर्चा आम है कि पुलिस की कथित मौन सहमति और परोक्ष शह के कारण बागबेड़ा में कानून व्यवस्था मजाक बनकर रह गई है, जहां आए दिन मनमानी का खुला खेल चल रहा है।
अवैध शराब और जुए के अड्डों से तबाह हो रहे घर : बागबेड़ा क्षेत्र के निचले और घनी आबादी वाले इलाकों की स्थिति बेहद दयनीय होती जा रही है। स्थानीय निवासियों का आरोप है कि गांधीनगर, रामनगर, बागबेड़ा बस्ती, बेड़ाडीपा और स्टेशन संजय नगर जैसे इलाकों में अवैध शराब की तस्करी, गांजा का अवैध कारोबार और खुलेआम चल रहे जुए के अड्डे युवाओं की जिंदगी बर्बाद कर रहे हैं। इन अवैध धंधों की वजह से कई हंसते-खेलते परिवार आर्थिक और सामाजिक बर्बादी की कगार पर पहुंच चुके हैं, लेकिन इसके बावजूद प्रशासनिक स्तर पर कभी कोई ठोस या स्थायी कार्रवाई नहीं की जाती।
पुलिस की भूमिका पर खड़े होते मुख्य सवाल
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अवैध धंधों पर खामोशी क्यों? गांधीनगर, रामनगर, बागबेड़ा बस्ती, बेड़ाडीपा और संजय नगर जैसे क्षेत्रों में खुलेआम चल रहे अवैध शराब और जुए के अड्डों पर पुलिस स्थायी कार्रवाई करने से क्यों कतराती है?
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अपराधियों को संरक्षण: क्या पुलिस की मौन सहमति के बिना ही इस क्षेत्र में अवैध कारोबारियों और मनमाने तौर पर कानून हाथ में लेने वालों का मनोबल इतना बढ़ सकता है?
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कार्रवाई में लीपापोती: गंभीर मामलों में भी दोषियों के खिलाफ सख्त प्राथमिकी दर्ज कर त्वरित कार्रवाई करने के बजाय पुलिस हमेशा लीपापोती का रास्ता क्यों चुनती है?
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बढ़ता जनरोष: पुलिस की इस लचर और संदेहास्पद कार्यशैली के कारण आम जनता का कानून से भरोसा उठने लगा है, जिसका खामियाजा पूरे इलाके के परिवारों को भुगतना पड़ रहा है।


































