वन विभाग के रिकॉर्ड में 0.809 हेक्टेयर वनभूमि पर अतिक्रमण की पुष्टि, कंपनी के दो अधिकारियों के नाम से दर्ज है आपराधिक मामला
फतेह लाइव, रिपोर्टर।
सरायकेला-खरसावां जिले के कांड्रा स्थित मेसर्स अमलगम स्टील एंड पावर लिमिटेड के एकीकृत स्टील प्लांट के विस्तार के लिए प्रस्तावित वनभूमि को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। वन विभाग के आधिकारिक पत्राचार में कंपनी पर 0.809 हेक्टेयर यानी करीब 2 एकड़ वनभूमि पर अतिक्रमण कर निर्माण करने की बात सामने आई है। मामले में वन अपराध संख्या CC 582/2022 दर्ज है और मामला न्यायालय में लंबित बताया गया है।

यह मामला ऐसे समय सामने आया है, जब कंपनी के मौजूदा स्टील प्लांट के विस्तार के लिए 34.83 हेक्टेयर (86.07 एकड़) वनभूमि के अपयोजन की स्वीकृति का प्रस्ताव भारत सरकार के पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के समक्ष विचाराधीन है। प्रस्ताव परिवेश 1.0 पोर्टल पर FP/JH/IND/116046/2020 के तहत दर्ज है।

वन विभाग के रिकॉर्ड में 10-11 साल पुराना निर्माण
प्रधान मुख्य वन संरक्षक-सह-कार्यकारी निदेशक, बंजर भूमि विकास बोर्ड, झारखंड, रांची के कार्यालय से 31 अगस्त 2026 को जारी पत्रांक 763 में क्षेत्रीय मुख्य वन संरक्षक, सिंहभूम, जमशेदपुर से प्राप्त निराकरण प्रतिवेदन का हवाला दिया गया है।

प्रतिवेदन के अनुसार, कंपनी द्वारा वनभूमि पर लगभग 10-11 वर्ष पहले मौजूदा संरचनाओं का निर्माण किए जाने की बात सामने आई है। वन विभाग ने यह भी रिपोर्ट किया है कि वनभूमि पर कन्वेयर बेल्ट का निर्माण किया गया था।

वन विभाग के अनुसार यह वन अपराध 6 जून 2022 को दर्ज किया गया। इसमें VSB Giridhar और Basant Kumar के नाम दर्ज हैं। संबंधित CC No. 582/2022 न्यायालय में लंबित है। इसके अलावा अतिक्रमण से संबंधित JPLE/BPLE Case No. 03/2022-23 भी लंबित बताया गया है।
सैटेलाइट और DSS विश्लेषण ने भी उठाए सवाल
भारत सरकार के पर्यावरण मंत्रालय द्वारा प्रस्ताव की समीक्षा के दौरान DSS (Decision Support System) विश्लेषण में प्रस्तावित वनभूमि के भीतर टूटे हुए वन पैच और कन्वेयर बेल्ट जैसी संरचना दिखाई देने का उल्लेख किया गया। मंत्रालय ने राज्य सरकार से इस कथित उल्लंघन की प्रकृति, क्षेत्रफल, समय, जिम्मेदार व्यक्तियों और अधिकारियों की भूमिका सहित विस्तृत रिपोर्ट मांगी थी। राज्य के वन विभाग की ओर से दिए गए जवाब में बताया गया कि वनभूमि पर पहले से निर्माण हो चुका था और वन अपराध दर्ज किया जा चुका है।
काम रोकने का निर्देश, लेकिन मामला अभी भी अदालत में
वन विभाग के निराकरण में कहा गया है कि उल्लंघन सामने आने के बाद कंपनी को वनभूमि पर आगे किसी प्रकार का काम या निर्माण नहीं करने का निर्देश दिया गया है। हालांकि, जिस भूमि पर पहले से निर्माण और कन्वेयर बेल्ट बनाए जाने की बात सामने आई है, उससे जुड़े आपराधिक और अतिक्रमण संबंधी मामले अभी न्यायालय में लंबित हैं।
वनभूमि पर दुर्लभ वन्यजीवों की मौजूदगी
प्रस्तावित वनभूमि और आसपास के क्षेत्र में जंगली बिल्ली (Jungle Cat), साही (Porcupine) और रॉक पाइथन (Rock Python) जैसी वन्यजीव प्रजातियों की मौजूदगी भी वन विभाग ने दर्ज की है। निरीक्षण रिपोर्ट में यह भी उल्लेख है कि क्षेत्र में हाथियों का कभी-कभार आवागमन होता है।
इसी कारण भारत सरकार ने प्रस्तावित परियोजना के प्रभाव को कम करने के लिए Site Specific Wildlife Management Plan की जानकारी मांगी थी। राज्य के जवाब में बताया गया कि कंपनी ने रांची की Crystal Consultants एजेंसी से वन्यजीव प्रबंधन योजना तैयार कराने का undertaking दिया है।
मुआवजा वनीकरण की जमीन पर भी उठे सवाल
परियोजना के लिए प्रस्तावित Compensatory Afforestation (CA) भूमि को लेकर भी भारत सरकार ने कई आपत्तियां उठाई थीं। DSS विश्लेषण में सरायकेला के समाल और बनमाकड़ी गांवों में प्रस्तावित CA भूमि के अलग-अलग पैच और वन क्षेत्र से उनकी दूरी को लेकर सवाल उठाए गए।
विभागीय जवाब के मुताबिक कंपनी ने CA के लिए प्रस्तावित कुछ जमीन खरीदने की प्रक्रिया शुरू की है, जबकि एक 0.38 हेक्टेयर के हिस्से की खरीद नहीं होने की बात सामने आई है। विभाग ने बताया कि शेष लगभग 4.92 हेक्टेयर भूमि खरीदी जा रही है और यह भूमि प्लॉट नंबर 657 के समीप है, जिसे अधिसूचित वन क्षेत्र बताया गया है।
हेसालोंग गांव की CA भूमि को लेकर भी DSS विश्लेषण में वन सीमा के साथ overlap पाया गया था। विभाग ने इसे पहले की KML फाइल की गलती बताते हुए संशोधित KML फाइल अपलोड करने की जानकारी दी है।
अब विस्तार की वन स्वीकृति पर निगाह
भारत सरकार के पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने 25 मई 2026 को प्रस्ताव पर 12 बिंदुओं पर स्पष्टीकरण मांगा था। राज्य सरकार ने क्षेत्रीय मुख्य वन संरक्षक, सिंहभूम, जमशेदपुर के 20 अगस्त 2026 के पत्र के माध्यम से प्राप्त निराकरण प्रतिवेदन के आधार पर इन आपत्तियों का जवाब भेजा है।
31 अगस्त के पत्र में प्रधान मुख्य वन संरक्षक (HoFF), झारखंड का अनुमोदन प्राप्त होने की बात भी कही गई है और भारत सरकार द्वारा उठाए गए बिंदुओं पर आवश्यक कार्रवाई का अनुरोध किया गया है।
अब बड़ा सवाल यह है कि जिस कंपनी के खिलाफ करीब 2 एकड़ वनभूमि पर अतिक्रमण और निर्माण को लेकर आपराधिक मामला न्यायालय में लंबित है, उसके मौजूदा प्लांट के विस्तार के लिए प्रस्तावित 86.07 एकड़ वनभूमि के अपयोजन पर अंतिम निर्णय क्या होगा। वनभूमि संरक्षण और औद्योगिक विस्तार के बीच यह मामला पर्यावरणीय निगरानी के लिहाज से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।



































