कर्ण से जुड़ी है 16 दिवसीय पितृपक्ष की पौराणिक कथा, गया के फल्गु तट को पिंडदान के लिए विशेष माना गया; तैयारियां शुरू
फतेह लाइव, रिपाेर्टर।
सनातन परंपरा में पितृपक्ष को अपने पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता व्यक्त करने का विशेष अवसर माना जाता है। इस वर्ष पितृपक्ष 26 सितंबर से शुरू होकर 16 दिनों तक चलेगा। इस दौरान लोग अपने पितरों के निमित्त श्राद्ध, तर्पण, पिंडदान, ब्राह्मण भोज और दान-पुण्य करते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इन कर्मों के जरिए पूर्वजों का स्मरण और उनके प्रति श्रद्धा अर्पित की जाती है।
कर्ण से जुड़ी है 16 दिनों की कहानी
पितृपक्ष से जुड़ी पौराणिक कथा महाभारत के दानवीर कर्ण से जोड़ी जाती है। मान्यता है कि मृत्यु के बाद जब कर्ण स्वर्ग पहुंचे तो उन्हें भोजन के बजाय सोना और आभूषण मिलने लगे। इसका कारण पूछने पर उन्हें बताया गया कि जीवन में उन्होंने खूब दान किया, लेकिन अपने पितरों के लिए अन्न और जल का दान नहीं किया था।
कर्ण ने बताया कि उन्हें अपने पूर्वजों के बारे में जानकारी नहीं थी। इसके बाद उन्हें 16 दिनों के लिए पृथ्वी पर लौटने का अवसर मिला। इस अवधि में उन्होंने पितरों के निमित्त श्राद्ध, तर्पण और अन्न-जल का दान किया। धार्मिक परंपरा में इसी कथा को 16 दिवसीय पितृपक्ष से जोड़ा जाता है।
घर पर भी किया जा सकता है तर्पण
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जो लोग किसी तीर्थस्थल पर नहीं जा पाते, वे घर पर भी पितरों का तर्पण कर सकते हैं। इसके लिए पवित्र स्थान पर कुश, गंगाजल, काले तिल, जौ और दूध आदि का प्रयोग करते हुए दक्षिण दिशा की ओर मुख करके तर्पण करने की परंपरा है।
इसके बाद पंचबलि की परंपरा के तहत कौआ, गाय, कुत्ता, चींटी आदि के लिए भोजन निकाला जाता है। ब्राह्मण को भोजन कराने और अपनी सामर्थ्य के अनुसार दान करने की भी धार्मिक परंपरा है।
गया में पिंडदान का विशेष महत्व
बिहार का गया जी पिंडदान और श्राद्ध कर्म के लिए प्रमुख तीर्थस्थल माना जाता है। फल्गु नदी के तट पर पिंडदान की परंपरा विशेष रूप से प्रसिद्ध है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, भगवान राम ने भी अपने पिता राजा दशरथ के लिए गया में पिंडदान किया था।
गया के अलावा काशी, प्रयागराज, हरिद्वार और बद्रीनाथ के ब्रह्मकपाल जैसे तीर्थस्थलों पर भी श्राद्ध और पिंडदान की परंपरा रही है। श्रद्धालु इन स्थानों पर पहुंचकर अपने पितरों के निमित्त धार्मिक अनुष्ठान करते हैं।
पितृपक्ष को लेकर श्रद्धालुओं के बीच तैयारियां शुरू हो गई हैं। सनातन धर्मावलंबियों में श्राद्ध और तर्पण को लेकर उत्साह है। कई लोग धार्मिक आयोजनों और भागवत कार्यक्रमों में शामिल होने के लिए अलग-अलग क्षेत्रों की ओर रवाना हुए हैं। वहीं, पितृपक्ष के दौरान पूजा-अर्चना और श्राद्ध कर्म के लिए लोग पंडितों से समय निर्धारित कराने में जुटे हैं।
पितृपक्ष के दौरान घरों और तीर्थस्थलों पर होने वाले कर्मकांडों में परिवार अपने दिवंगत पूर्वजों का स्मरण करते हैं। धार्मिक मान्यता के साथ-साथ यह परंपरा परिवार की पिछली पीढ़ियों के प्रति सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर भी मानी जाती है।




































