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Fateh Live : प्रधानमंत्री की इजरायल यात्रा के निहितार्थ

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निशिकांत ठाकुर.

प्रधानमंत्री के दुबारा इजरायल यात्रा पर देश में घमासान मचा हुआ है। तरह—तरह के कयास लगाए जा रहे हैं और कई अनहोनी का अनुमान की आशंका भी जताई जा रही है। प्रधानमंत्री की पहली यात्रा 2017 में हुई थी, उस समय भी बवाल मचा था, लेकिन इस वर्ष उनके दौरे को अनावश्यक दौरे के रूप में देखा जा रहा है। कहा जाता है कि नीतियुक्त कार्य नेक इरादे से किया हुआ हो, इतना ही काफी नहीं है; बल्कि वह बिना दबाव के भी किया हुआ होना चाहिए। सवाल यह है कि इस यात्रा के निहितार्थ क्या हैं, तथा इसका लाभ भारतीय जनता को क्या मिलेगा? बहुतेरे यह मानने लगे हैं कि जिन बातों का दूसरों से संबंध होता हो, उनमें तो हमें कायदे से व्यवहार करना चाहिए; पर जब तक हमारे कामों का दूसरों से संबंध न हो, तब तक हम अपनी मर्जी के मुताबिक जैसा चाहें, वैसा व्यवहार कर सकते हैं। जो व्यक्ति ऐसा मानता हो, वह बिना समझे बोलता है। दुनिया में रहकर कोई भी आदमी बिना अपनी हानि किए खुदमुख्तार या स्वच्छंद व्यवहार नहीं कर सकता।

प्रधानमंत्री ने इजरायल यात्रा पर जाने से पूर्व देशवासियों के नाम संदेश दिया था कि भारत और इज़राइल के बीच एक सुदृढ़ एवं बहुआयामी सामरिक साझेदारी है, जिसमें हाल के वर्षों में उल्लेखनीय प्रगति और गतिशीलता देखी गई है। विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, नवाचार, कृषि, जल प्रबंधन, प्रौद्योगिकी, रक्षा एवं सुरक्षा, व्यापार एवं निवेश और दोनों देशों के लोगों के परस्‍पर संबंधों सहित, विभिन्न क्षेत्रों में हमारे सहयोग को और सशक्त बनाने के उद्देश्य से प्रधानमंत्री नेतन्याहू के साथ होने वाली अपनी चर्चाओं की मैं प्रतीक्षा कर रहा हूं। हम आपसी हित के क्षेत्रीय एवं वैश्विक मुद्दों पर भी विचारों का आदान-प्रदान करेंगे। इस यात्रा के दौरान मैं इज़राइल के राष्ट्रपति इसाक हर्ज़ोग से भी भेंट करूंगा। मुझे इज़राइली संसद ‘केनेस्सेट’ को संबोधित करने वाला प्रथम भारतीय प्रधानमंत्री बनने का भी सम्मान प्राप्त होगा। यह अवसर हमारे दोनों देशों को जोड़ने वाले सुदृढ़ संसदीय और लोकतांत्रिक संबंधों को एक श्रद्धांजलि होगा। मैं भारतीय प्रवासी समुदाय के उन सदस्यों के साथ संवाद करने की भी उत्सुकता से प्रतीक्षा कर रहा हूं, जो लंबे समय से भारत-इज़राइल की विशेष मित्रता को सुदृढ़ करते रहे हैं। मुझे विश्वास है कि मेरा यह राजकीय दौरा दोनों देशों के बीच स्थायी संबंधों को और सुदृढ़ करेगा, सामरिक साझेदारी के लिए नए लक्ष्य निर्धारित करेगा तथा एक सुदृढ़,  समृद्ध भविष्य के लिए हमारी साझा दृष्टि को आगे बढ़ाएगा।

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व्यापार और रक्षा संबंधों को मजबूत करने के उद्देश्य से आयोजित दो दिवसीय यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू से भेंट की। इस यात्रा की इजराइल में आलोचना भी हुई है। पीएम मोदी को ‘एक मित्र से बढ़कर’ बताते हुए नेतन्याहू ने भारतीय नेता की जमकर प्रशंसा की और 7 अक्टूबर, 2023 के भयावह हमले के बाद इजराइल के साथ खड़े रहने के लिए उन्हें धन्यवाद भी दिया। पीएम मोदी उन पहले विश्व नेताओं में से थे जिन्होंने हमास द्वारा किए गए घातक हमलों की निंदा की थी, जिसमें लगभग 1,200 इजराइली मारे गए थे और लगभग 250 का अपहरण किया गया था। बेंजामिन नेतन्याहू ने अपने भाषण की शुरुआत में कहा, ‘प्रधानमंत्री और राष्ट्राध्यक्ष जब भी नेसेट (इजरायल की संसद) में आते हैं, तो यह हम सभी के लिए हमेशा एक रोमांचक क्षण होता है। लेकिन मेरे प्रिय मित्र नरेंद्र, आपकी यात्रा से मैं विशेष रूप से भावुक हूं। आप इजरायल के एक महान मित्र और विश्व मंच पर एक महान नेता हैं। नरेंद्र, आप मेरे लिए सिर्फ एक मित्र से कहीं बढ़कर हैं। आप मेरे भाई हैं।’ दोनों नेताओं के बीच की घनिष्ठता इज़राइल में खूब चर्चित रही है, और यह स्पष्ट रूप से संसद (कंसाट) में भी देखने को मिली, जहां उपस्थित लोगों और सांसदों ने एक-दूसरे को गले लगाया और खड़े होकर तालियां बजाईं। हालांकि, मीडिया ने यह नहीं दिखाया कि किस तरह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाषण शुरू करते ही इजरायल के विपक्षी नेताओं ने वाकआउट किया। खैर…! इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने दिसंबर में ही इस यात्रा की घोषणा कर दी थी, जिससे मोदी की मेजबानी में इजरायल की गहरी रुचि का संकेत मिलता है। मोदी के आगमन से लेकर उनके प्रस्थान तक, नेतन्याहू ने व्यक्तिगत रूप से मोदी को हर जगह एस्कॉर्ट किया।

17 सितंबर 1950 को भारत ने इजराइल को संप्रभु राष्ट्र के रूप में मान्यता दी थी । इसके बाद से किसी प्रधानमंत्री ने इजराइल का दौरा नहीं किया था। अर्थात, क़रीब 76 साल बाद जुलाई 2017 में नरेंद्र मोदी इजराइल दौरा करने वाले पहले प्रधानमंत्री बने। यानी, मोदी ने इजराइल नहीं जाने की परंपरा तोड़ी । 2017 में मोदी जब इजराइल गए, तो कूटनीतिक परंपरा से अलग क़दम उठाते हुए रामल्ला में फिलस्तीनी प्राधिकरण की अनदेखी की, जो नेतन्याहू के येरूशलम स्थित परिसर से मुश्किल से 30 मिनट की दूरी पर है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की येरुशलम की 24 घंटे की यात्रा इजरायल के साथ द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करने का एक महत्वपूर्ण प्रयास था, लेकिन फिलिस्तीन के मुद्दे पर एक चूक साबित हुई, जिसके पश्चिम एशिया के साथ भारत के संबंधों पर जटिल परिणाम होंगे।

26 फरवरी को द्विपक्षीय वार्ता के बाद दोनों नेताओं ने संबंधों को ‘विशेष रणनीतिक साझेदारी’ के स्तर तक बढ़ाने पर सहमति जताई और कृत्रिम बुद्धिमत्ता, कृषि, संस्कृति और शिक्षा के क्षेत्र में 15 से अधिक समझौता ज्ञापनों सहित एक महत्वपूर्ण प्रौद्योगिकी साझेदारी पर हस्ताक्षर किए। उन्होंने अगले पांच वर्षों में इजरायल में 50,000 भारतीय श्रमिकों के रोजगार को सुगम बनाने पर भी सहमति जताई। यह मुलाकात और नेतन्याहू द्वारा मोदी और भारत के साथ संबंधों की प्रशंसा मोदी की 2017 की यात्रा की तुलना में कहीं अधिक गहन थी। यह संभवतः इस यात्रा के समय से जुड़ा है, क्योंकि गाजा में जानमाल के भारी नुकसान और नेतन्याहू की वेस्ट बैंक में बस्ती बसाने की योजनाओं को लेकर इज़राइल लगातार अलग-थलग पड़ रहा है। पिछले सप्ताह, इज़राइल के वेस्ट बैंक प्रस्तावों की दर्जनों देशों ने निंदा की है, जिनमें जर्मनी, फ्रांस और ब्रिटेन शामिल हैं, जिन्होंने अब तक संयमित रुख अपनाया है। नेतन्याहू को इस साल के अंत में चुनाव का सामना करना है, जिसे उनके कार्यकाल पर जनमत संग्रह के रूप में देखा जाएगा, जिसमें उनकी सरकार में कथित भ्रष्टाचार के साथ-साथ 2023 में सुरक्षा चूक और इज़राइल की कार्रवाई में आम नागरिकों की मौत के लिए उनकी जवाबदेही भी शामिल है।

वैसे, मोदी की इस यात्रा से उन्हें राजनीतिक रूप से मजबूती मिलने की उम्मीद है। नेसेट में अपने भाषण में मोदी ने फिलिस्तीनी संप्रभुता का केवल अप्रत्यक्ष रूप से उल्लेख किया और कहा कि अमेरिका के नेतृत्व वाली गाजा शांति पहल, जो दो-राज्य समाधान के लिए प्रतिबद्ध है। प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत हमास द्वारा अक्टूबर 2023 में किए गए आतंकी हमले में जान गंवाने वाले हर व्यक्ति के दर्द और शोक में शामिल है, लेकिन उन्होंने तब से इजरायल द्वारा गाजा पर किए गए हमलों में अब तक मारे गए 72,000 से अधिक लोगों का कोई जिक्र नहीं किया।

देश में एक महत्वपूर्ण आलोचना यह हो रही है कि इजरायली प्रधानमंत्री और उनके पूर्व रक्षा मंत्री योआव गैलेंट गाजा में संदिग्ध युद्ध अपराधों के आरोप में अंतर्राष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (आईसीसी) द्वारा उनके खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी किए जाने के बाद मोदी की इजराइल यात्रा का औचित्य क्या है! इजराइल आईसीसी के अधिकार को मान्यता नहीं देता है और नेतन्याहू और गैलेंट आत्मसमर्पण नहीं करेंगे, लेकिन इन दोनों की दुनिया अब काफी छोटी हो गई है। मालूम हो कि अंतरराष्ट्रीय क्रिमिनल कोर्ट नीदरलैंड के हेग स्थित एक स्वतंत्रस्थायी न्यायिक निकाय है। यह 1 जुलाई, 2002 को ‘रोम संविधि’ के तहत स्थापित हुआ था, जो नरसंहार, युद्ध, मानवता के विरुद्ध अपराधों और आक्रामकता के अपराधों के लिए लोगों पर मुकदमा चलाता है, संयुक्त राष्ट्र का हिस्सा नहीं है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं)

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