भारतीय सांकेतिक भाषा संवाद की नई राह खोल रही, टाटा स्टील फाउंडेशन का ‘सबल’ बढ़ा रहा जागरूकता और अवसर
फतेह लाइव, डेस्क।
भाषा केवल शब्दों से बातचीत करने का माध्यम नहीं है। यह अपनी बात कहने, भावनाएं व्यक्त करने, रिश्ते बनाने, समाज में भागीदारी निभाने और अपनी पहचान को समझने का जरिया भी है। बधिर समुदाय के लिए भारतीय सांकेतिक भाषा (Indian Sign Language-ISL) इसी संवाद और पहचान का महत्वपूर्ण माध्यम है।

हाथों के संकेत, चेहरे के भाव और दृश्य माध्यमों के जरिए अर्थ व्यक्त करने वाली ISL एक स्वतंत्र और पूर्ण भाषा है। इसकी अपनी भाषा-व्यवस्था और नियम हैं। यह किसी बोली जाने वाली भाषा का केवल दृश्य रूप या हाथों के इशारों का संग्रह नहीं है।
भारत में अपनी अलग पहचान रखती है ISL
दुनिया के अलग-अलग देशों और समुदायों में सांकेतिक भाषाएं अलग-अलग रूप में विकसित हुई हैं। भारत में बधिर समुदाय के बीच भारतीय सांकेतिक भाषा का इस्तेमाल होता है और इसकी अपनी विशिष्ट संरचना है।
ISL केवल बधिर समुदाय तक सीमित भाषा नहीं है। माता-पिता, शिक्षक, दोस्त, सहकर्मी, स्वास्थ्यकर्मी और सेवा प्रदाता सहित समाज का कोई भी व्यक्ति इसे सीख सकता है। जब अधिक लोग सांकेतिक भाषा में संवाद करने लगते हैं, तो शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य सेवाओं और सामाजिक जीवन में सहभागिता के अवसर भी व्यापक होते हैं।
भारत में ISL को संस्थागत रूप देने की दिशा में बधिर समुदाय के लगातार प्रयासों की अहम भूमिका रही है। भारत सरकार ने वर्ष 2011 में भारतीय सांकेतिक भाषा अनुसंधान एवं प्रशिक्षण केंद्र (ISLRTC) की स्थापना को मंजूरी दी। इसके बाद सितंबर 2015 में ISLRTC को दिव्यांगजन सशक्तिकरण विभाग के तहत एक स्वायत्त संगठन के रूप में स्थापित किया गया।
ISLRTC का उद्देश्य भारतीय सांकेतिक भाषा को बढ़ावा देना और विकसित करना, इस क्षेत्र में शोध करना तथा प्रशिक्षण और सीखने के लिए आवश्यक सामग्री तैयार करना है।
समय के साथ भारतीय सांकेतिक भाषा शब्दकोश, दुभाषियों और शिक्षकों के प्रशिक्षण तथा ISL में शैक्षणिक सामग्री तैयार करने जैसी पहलें भी सामने आई हैं। यह इस बात को रेखांकित करता है कि भाषा तक पहुंच, वास्तविक समावेशन की बुनियादी शर्तों में से एक है।
‘सबल’ से बढ़ रही संवाद और सहभागिता की पहुंच
जमीनी स्तर पर समावेशन तभी सार्थक होता है, जब वह लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी में अवसरों के रूप में दिखाई दे। टाटा स्टील फाउंडेशन का दिव्यांगजन समावेशन कार्यक्रम ‘सबल’ भारतीय सांकेतिक भाषा के प्रति जागरूकता बढ़ाने और बधिर समुदाय के लिए सहभागिता के अवसर मजबूत करने की दिशा में काम कर रहा है।
सबल की ओर से स्कूलों, कॉलेजों, कंपनियों और परिवारों के लिए ISL जागरूकता सत्र आयोजित किए जाते हैं। इन सत्रों के माध्यम से लोगों को बधिर समुदाय की संस्कृति, संवाद के तरीकों और सांकेतिक भाषा के बुनियादी संकेतों को समझने का अवसर मिलता है।
इस पहल का उद्देश्य केवल कुछ संकेत सिखाना नहीं, बल्कि संवाद को लेकर ऐसी सोच विकसित करना है, जिसमें हर व्यक्ति के लिए जगह हो।
शिक्षा से खेल तक, अवसरों का विस्तार
सबल बधिर समुदाय के लिए भारतीय सांकेतिक भाषा का बुनियादी प्रशिक्षण उपलब्ध कराने के साथ-साथ क्षमता विकास और आगे बढ़ने के अवसरों पर भी काम करता है।
बधिर लोगों के लिए चलाया जा रहा एथलेटिक प्रशिक्षण कार्यक्रम खेल को अनुशासन, टीमवर्क और आत्मविश्वास से जोड़ता है। इसके माध्यम से प्रतिभागियों को अपनी क्षमताओं और रुचियों को पहचानने तथा उन्हें विकसित करने का अवसर मिलता है।
शिक्षा भी इस प्रयास का महत्वपूर्ण हिस्सा है। जमशेदपुर के कार्मेल बाल विहार में नोआमुंडी के बधिर समुदाय के 12 विद्यार्थी कक्षा VIII से XII तक आवासीय शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। यहां उन्हें शिक्षा के साथ सहयोगपूर्ण वातावरण और समग्र विकास के अवसर भी मिल रहे हैं।
गांवों तक पहुंच रही सांकेतिक भाषा की समझ
ISL को लेकर जागरूकता का दायरा केवल स्कूलों और संस्थानों तक सीमित नहीं है। जोडा, नोआमुंडी और दानागाडी में आयोजित जागरूकता सत्रों के जरिए सांकेतिक भाषा और सुलभ संवाद की चर्चा ग्रामीण समुदायों तक पहुंचाई जा रही है।
समावेशन तभी स्थायी बन सकता है, जब इसकी समझ केवल दिव्यांगजनों तक सीमित न रहे, बल्कि परिवार, स्कूल, कार्यस्थल और आसपास का समुदाय भी संवाद की बाधाओं को समझे और उन्हें कम करने की दिशा में आगे बढ़े।
यही कारण है कि सुगम्यता का अर्थ दिव्यांगजनों के लिए अलग दुनिया तैयार करना नहीं, बल्कि मौजूदा दुनिया को सभी के लिए अधिक सुलभ बनाना है।
23 सितंबर : अंतरराष्ट्रीय सांकेतिक भाषा दिवस
हर वर्ष 23 सितंबर को अंतरराष्ट्रीय सांकेतिक भाषा दिवस मनाया जाता है। संयुक्त राष्ट्र ने वर्ष 2017 में इस दिवस की घोषणा की थी और पहली बार इसे 2018 में मनाया गया। यह तिथि 23 सितंबर 1951 को वर्ल्ड फेडरेशन ऑफ द डेफ की स्थापना की स्मृति से जुड़ी है।
वर्ष 2026 में 21 से 27 सितंबर तक अंतरराष्ट्रीय बधिरजनों सप्ताह मनाया जा रहा है, जिसका केंद्र बिंदु “बधिरजनों के मानवाधिकारों की घोषणा” है। वर्ल्ड फेडरेशन ऑफ द डेफ के 2026 के संदेश में सांकेतिक भाषा के अधिकारों को मानवाधिकार, समावेशी शिक्षा, सुगम्यता, सहभागिता और बधिर संस्कृति के व्यापक संदर्भ से जोड़ा गया है।
इसी क्रम में ‘सबल’ भारतीय सांकेतिक भाषा पर केंद्रित एक महीने लंबे आयोजन के माध्यम से इस विषय को केवल एक दिन तक सीमित रखने के बजाय लगातार चर्चा और जागरूकता का हिस्सा बना रहा है।
इस पहल का उद्देश्य लोगों को ISL सीखने के लिए प्रोत्साहित करना और यह समझ विकसित करना है कि संवाद तक पहुंच, समाज में बराबर की सहभागिता का आधार है।
2017 में शुरू हुआ ‘सबल’, अब व्यापक इकोसिस्टम
टाटा स्टील फाउंडेशन के दिव्यांगजन समावेशन कार्यक्रम ‘सबल’ की शुरुआत 2017 में नोआमुंडी में हुई थी। इसका उद्देश्य कौशल विकास, जागरूकता, रोजगारपरकता और सामुदायिक सहभागिता के माध्यम से दिव्यांगजनों के लिए अवसरों का सृजन करना है।
समय के साथ यह पहल एक व्यापक इकोसिस्टम के रूप में विकसित हुई है, जिसमें अधिकार-आधारित समावेशन, शिक्षा, कौशल विकास, आजीविका, खेल और सामुदायिक सहभागिता के साथ ऐसे मंच भी शामिल हैं, जहां दिव्यांगजन अपनी क्षमताओं और आकांक्षाओं को सामने रख सकें।
सबल अब झारखंड और ओडिशा के कई प्रखंडों में काम कर रहा है। ग्रामीण समुदायों तक पहुंच बनाने और दिव्यांगजनों के अधिकारों एवं अवसरों तक उनकी पहुंच मजबूत करने पर भी जोर दिया जा रहा है। सबल का मूल विचार दिव्यांगता के बजाय संभावनाओं, बाधाओं के बजाय अवसरों और केवल सहभागिता के बजाय नेतृत्व पर ध्यान केंद्रित करना है।
जब हाथ बोलें, तो समाज को सुनना भी सीखना होगा
भारतीय सांकेतिक भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि समान अवसर और सामाजिक सहभागिता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कड़ी है। स्कूल से कार्यस्थल तक और परिवार से समुदाय तक, जब संवाद की दीवारें कम होती हैं, तो समावेशन की संभावनाएं बढ़ती हैं। आखिरकार, जब हाथ बोलते हैं, तो समावेशन को भी सुनना चाहिए।




































