छात्रों के जख्म और मुख्यमंत्री की पुलिस-प्रशंसा के बीच खड़ा एक बड़ा सवाल
फतेह लाइव के लिए।
झारखंड की राजनीति में इन दिनों सबसे बेचैन करने वाली तस्वीर विधानसभा के बाहर दिखाई दे रही है। एक तरफ रोजगार और प्रतियोगी परीक्षाओं की पारदर्शिता की मांग को लेकर सड़कों पर उतरे युवा हैं, दूसरी तरफ लोकतंत्र की भाषा बोलती सरकार और उसके बीच खड़ी पुलिस की लाठियां हैं। सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि छात्रों ने बैरिकेडिंग क्यों तोड़ी या पुलिस ने बल प्रयोग क्यों किया। असली सवाल यह है कि जब सरकार स्वयं कह रही है कि छात्रों की आवाज सुनना उसकी जिम्मेदारी है, तब उसी आवाज को लाठी, आंसू गैस और वाटर कैनन से जवाब देने की नौबत आखिर आई क्यों?
10 अगस्त को रांची में JPSC-JSSC से जुड़ी कथित अनियमितताओं के खिलाफ चल रहा छात्र आंदोलन विधानसभा घेराव के दौरान हिंसक टकराव में बदल गया। समाचार रिपोर्टों के अनुसार पुलिस ने वाटर कैनन और आंसू गैस का इस्तेमाल किया तथा लाठीचार्ज किया। छात्रों की ओर से भी बैरिकेडिंग तोड़ने और पुलिस पर पथराव की बात सामने आई है। घायलों की संख्या को लेकर अलग-अलग दावे हैं; कई रिपोर्टों में बड़ी संख्या में छात्रों के घायल होने की बात कही गई है। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम का सबसे विचित्र और राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण पहलू पुलिस कार्रवाई से भी आगे है—मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन का घटनाक्रम के बाद का संदेश।
मुख्यमंत्री ने पुलिस और प्रशासन के अधिकारियों तथा जवानों को स्थिति संभालने के लिए धन्यवाद दिया। साथ ही उन्होंने छात्रों से कहा कि लोकतंत्र में अपनी बात रखने का उनका अधिकार है, सरकार उनकी आवाज का सम्मान करती है और उनकी मांगों पर गंभीरता से कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने संवाद और विश्वास के रास्ते से समाधान निकालने की बात भी कही।
यह संदेश पढ़ने में अत्यंत संवेदनशील है। भाषा में युवाओं के प्रति सम्मान है, लोकतंत्र का उल्लेख है, संवाद की बात है और परीक्षा व्यवस्था को पारदर्शी, तकनीक-सक्षम, सुरक्षित तथा जवाबदेह बनाने का संकल्प भी है। लेकिन फिर सवाल उठता है—यह सब उसी दिन क्यों कहा गया, जिस दिन उन्हीं छात्रों पर पुलिस का बल प्रयोग हुआ?
सरयू राय ने समस्या की नस पकड़ ली है
जमशेदपुर पश्चिम के विधायक सरयू राय ने मुख्यमंत्री को जो सलाह दी है, वह इस पूरे प्रकरण को समझने की एक महत्वपूर्ण राजनीतिक खिड़की खोलती है। उन्होंने कहा है कि राज्यहित में छात्र आंदोलन का शीघ्र समाधान जरूरी है। मुख्यमंत्री को कूटनीतिक पहल के बजाय छात्रों से सीधे संपर्क करने, उनकी विधिसम्मत मांगों को स्वीकार करने की एकतरफा घोषणा करने और युवाओं के भविष्य को लेकर उनकी चिंता का समाधान करने की सलाह दी है। साथ ही उन्होंने आंदोलन के आईने में सरकारी भ्रष्टाचार की व्यापक झलक महसूस करने की बात कही है।
सरयू राय का यह बयान महज विपक्षी राजनीति का एक सामान्य बयान मानकर खारिज कर देना आसान होगा। लेकिन क्या इसे इतनी आसानी से खारिज किया जा सकता है?
17 दिन से छात्र आंदोलन कर रहे हों, सरकार और छात्र आमने-सामने हों, मामला परीक्षा और भर्ती की विश्वसनीयता से जुड़ा हो और अंततः विधानसभा की ओर बढ़ते छात्रों पर पुलिस बल का प्रयोग करना पड़े—तो यह किसी भी सरकार के लिए आत्ममंथन का विषय होना चाहिए।
सरकार को सबसे पहले यह पूछना चाहिए कि समस्या यहां तक पहुंची कैसे?
छात्रों को विधानसभा तक पहुंचने से रोकने के लिए बैरिकेडिंग की गई। छात्र आगे बढ़े। पुलिस ने वाटर कैनन चलाया। आंसू गैस छोड़ी गई। फिर लाठीचार्ज हुआ। दूसरी ओर पुलिस का कहना है कि प्रदर्शनकारियों ने बैरिकेड तोड़े और पथराव किया। यानी दोनों पक्षों के अपने-अपने तर्क हैं। लेकिन लोकतांत्रिक सरकार का दायित्व केवल यह तय करना नहीं है कि टकराव में कौन पहले आगे बढ़ा। उसका दायित्व यह भी है कि टकराव की स्थिति पैदा ही क्यों हुई, इसकी राजनीतिक और प्रशासनिक जिम्मेदारी तय की जाए।
मुख्यमंत्री का ट्वीट और जमीन पर सरकार—दो अलग तस्वीरें
हेमंत सोरेन का संदेश कहता है—आपकी आवाज का सम्मान करना सरकार की जिम्मेदारी है।
सड़क की तस्वीर कहती है—आपकी आवाज को रोकने के लिए बैरिकेड, वाटर कैनन, आंसू गैस और लाठी मौजूद हैं।
मुख्यमंत्री कहते हैं—आइए, संवाद और विश्वास के साथ समाधान करें।
लेकिन छात्र पूछ सकते हैं—अगर संवाद ही समाधान है तो संवाद के लिए विधानसभा की ओर बढ़ते छात्रों के सामने लाठियां क्यों खड़ी थीं?
मुख्यमंत्री कहते हैं कि सरकार ने छात्रों की बात सुनी है और वरिष्ठ मंत्री उनसे लगातार संवाद करते रहे हैं। यह अच्छी बात है। लेकिन यदि 17 दिन के आंदोलन के बाद भी छात्र सड़कों पर हैं और अंततः विधानसभा घेराव तक पहुंच गए, तो यह भी स्वीकार करना पड़ेगा कि सरकार का संवाद छात्रों को पर्याप्त आश्वस्त नहीं कर पाया। यही वह बिंदु है जहां सरयू राय की सलाह महत्वपूर्ण हो जाती है। कूटनीति नहीं, सीधा संवाद। सरकार को प्रतिनिधिमंडल भेजकर, मध्यस्थों के जरिए अथवा राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के रास्ते से आगे बढ़ने के बजाय स्वयं छात्रों के बीच जाना चाहिए। मुख्यमंत्री को उनसे सीधे बात करनी चाहिए। उनकी मांगों को एक-एक करके सामने रखना चाहिए और स्पष्ट करना चाहिए कि कौन-सी मांग विधिसम्मत है, कौन-सी संभव है और कौन-सी नहीं। यही लोकतांत्रिक राजनीति की खूबसूरती होती।
पुलिस की पीठ थपथपाने का सवाल
सबसे ज्यादा असहज करने वाली बात मुख्यमंत्री का पुलिस और प्रशासन को धन्यवाद देना है। निस्संदेह पुलिस पर भीड़ को नियंत्रित करने की जिम्मेदारी होती है। अगर प्रदर्शनकारियों ने पथराव किया, बैरिकेड तोड़े या कानून-व्यवस्था बिगाड़ने की कोशिश की, तो प्रशासन को कार्रवाई करनी ही होगी। यह बात लोकतंत्र के पक्ष में खड़े किसी भी व्यक्ति को स्वीकार करनी चाहिए। लेकिन उतनी ही मजबूती से यह भी पूछा जाना चाहिए कि क्या बल प्रयोग आवश्यक सीमा में हुआ? क्या हर विकल्प आजमाने के बाद लाठी चली? क्या महिलाओं और छात्रों के साथ बल प्रयोग की शिकायतों की स्वतंत्र जांच होगी? क्या पुलिस की कार्रवाई की वीडियोग्राफी की समीक्षा होगी? इन सवालों का जवाब सरकार को देना चाहिए। क्योंकि कानून-व्यवस्था बनाए रखना पुलिस का अधिकार और कर्तव्य है, लेकिन पुलिस की हर कार्रवाई को सही मान लेना मुख्यमंत्री का कर्तव्य नहीं हो सकता। मुख्यमंत्री को तो सबसे पहले यह देखना चाहिए कि कहीं प्रशासन ने ऐसी स्थिति पैदा तो नहीं कर दी, जिसमें सरकार और उसके अपने युवा नागरिक आमने-सामने खड़े हो गए।
राहुल गांधी का सवाल और सरकार की राजनीतिक असहजता
इस पूरे घटनाक्रम का एक और गंभीर पहलू है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने भी छात्रों पर पुलिस कार्रवाई को गलत बताया। उनकी टिप्पणी इसलिए राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि झारखंड में हेमंत सोरेन सरकार कांग्रेस सहित गठबंधन के सहयोगियों के साथ सत्ता में है। राहुल गांधी का पुलिस कार्रवाई की आलोचना करना सरकार के लिए असहज करने वाला सवाल खड़ा करता है। यहां राजनीति से ज्यादा महत्वपूर्ण सिद्धांत है। यदि किसी भी दल का नेता सत्ता में रहते हुए छात्रों पर बल प्रयोग को उचित समझता है और विपक्ष में रहते हुए उसी बल प्रयोग को लोकतंत्र विरोधी बताता है, तो लोकतंत्र हारता है। आज सवाल कांग्रेस का नहीं, भाजपा का नहीं, झामुमो का नहीं है। सवाल यह है कि क्या रोजगार और परीक्षा की पारदर्शिता की मांग करने वाले युवाओं को राज्य सत्ता के सामने अपनी बात रखने के लिए लाठियां खानी पड़ेंगी? क्या छात्रों की हर मांग मान लेना समाधान है? नहीं। यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि छात्रों की हर मांग को केवल इसलिए स्वीकार नहीं किया जा सकता क्योंकि वे आंदोलन कर रहे हैं। किसी भी परीक्षा को रद्द करना, दोबारा परीक्षा लेना या CBI जांच कराना—हर मांग के अपने कानूनी और प्रशासनिक पहलू हैं। सरकार को कानून, नियम और उपलब्ध तथ्यों के आधार पर निर्णय लेना चाहिए।
लेकिन जो मांग कानून सम्मत है, जिसे सरकार पूरा कर सकती है और जिसके पीछे हजारों युवाओं का भविष्य जुड़ा है, उसे टालते रहने का भी कोई औचित्य नहीं है। यही सरयू राय की सलाह का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है—विधिसम्मत मांगों को मान लेने की एकतरफा घोषणा। सरकार यदि ऐसा करती है तो वह कमजोर नहीं बल्कि मजबूत होगी। क्योंकि लोकतंत्र में सरकार की ताकत इस बात से नहीं मापी जाती कि उसने कितने प्रदर्शनकारियों को पुलिस से हटवाया। सरकार की ताकत इस बात से मापी जाती है कि उसने कितनी जल्दी जनता की वास्तविक समस्या को समझकर उसका समाधान किया।
भ्रष्टाचार की छाया से बड़ी है विश्वसनीयता की समस्या
सरयू राय ने आंदोलन के आईने में सरकारी भ्रष्टाचार की व्यापक झलक महसूस करने की बात कही है। यहां शब्दों को सावधानी से समझना होगा। भ्रष्टाचार के आरोपों का अंतिम सत्य जांच और प्रमाण से ही तय होगा। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि जब भर्ती और प्रतियोगी परीक्षाओं की विश्वसनीयता पर सवाल उठते हैं, तो सबसे बड़ा नुकसान सरकार की छवि को नहीं, युवा पीढ़ी के विश्वास को होता है। एक छात्र वर्षों तक पढ़ता है। परिवार अपनी आर्थिक क्षमता से आगे बढ़कर उसे पढ़ाता है। वह परीक्षा देता है। परिणाम का इंतजार करता है। फिर यदि उसे लगता है कि परीक्षा व्यवस्था में गड़बड़ी हुई है, तो उसके हाथ में केवल दो चीजें बचती हैं—न्याय की उम्मीद और आंदोलन का रास्ता। यदि न्याय की उम्मीद कमजोर होगी तो आंदोलन मजबूत होगा। और यदि आंदोलन को लाठी मिलेगी तो अविश्वास और गहरा होगा। यही वह चक्र है जिसे किसी भी सरकार को तोड़ना चाहिए।
हेमंत सोरेन को अपने ही ट्वीट को फिर पढ़ना चाहिए
मुख्यमंत्री का ट्वीट वास्तव में संवेदनशील है। लेकिन शायद उन्हें इसे एक बार फिर पढ़ना चाहिए—इस बार मुख्यमंत्री के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐसे युवा के रूप में जो रोजगार के लिए प्रतियोगिता परीक्षा की तैयारी कर रहा है। वे खुद से पूछें—क्या उस छात्र को यह संदेश मिलेगा कि सरकार उसकी आवाज सुन रही है? या उसे यह दिखाई देगा कि सरकार पहले पुलिस से उसे रोकती है और फिर सोशल मीडिया पर संवाद की अपील करती है? क्या वह यह समझेगा कि उसकी मांगों पर गंभीरता से विचार हो रहा है? या वह यह मानेगा कि सरकार आंदोलन को विपक्ष की साजिश बताकर मूल प्रश्न से बचना चाहती है? क्योंकि मुख्यमंत्री के संदेश में विपक्ष पर छात्रों को भटकाने का आरोप भी है। हर आंदोलन में राजनीति घुस सकती है। लेकिन हर आंदोलन राजनीतिक साजिश नहीं होता। यह फर्क सरकार को समझना होगा। यदि हजारों युवा किसी मांग को लेकर लगातार 17 दिनों तक सड़क पर हैं, तो सबसे पहले उनकी पीड़ा को देखना चाहिए, न कि उनके पीछे खड़े राजनीतिक चेहरों को।
अब वक्त बयान का नहीं, निर्णय का है
झारखंड के सामने इस समय सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि सोमवार को किसने बैरिकेड तोड़ा और किसने लाठी चलाई। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि राज्य अपने युवाओं का विश्वास कैसे वापस हासिल करेगा? सरकार चाहे तो इसे राजनीतिक षड्यंत्र कहकर आगे बढ़ सकती है। विपक्ष चाहे तो इसे सरकार के खिलाफ बड़ा राजनीतिक हथियार बना सकता है। पुलिस अपनी कार्रवाई को कानून-व्यवस्था के नजरिए से सही ठहरा सकती है। छात्र अपनी चोटों को आंदोलन की ताकत बना सकते हैं।
लेकिन इन सबके बीच झारखंड का युवा कहां जाएगा? यही वह सवाल है जिसका उत्तर मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को देना है। सरयू राय ने रास्ता सुझा दिया है—सीधा संवाद, विधिसम्मत मांगों की स्वीकृति और व्यवस्था के भीतर मौजूद खामियों की ईमानदार पड़ताल। अब मुख्यमंत्री को तय करना है कि वे इस सलाह को राजनीतिक चुनौती मानते हैं या राज्यहित का अवसर। क्योंकि लाठी से आंदोलन दबाया जा सकता है, लेकिन युवा मन का अविश्वास नहीं। इतिहास गवाह है—जब सरकारें अपने युवाओं की आवाज सुनने में देर करती हैं, तो सड़कें धीरे-धीरे सवाल पूछने लगती हैं। आज रांची की सड़कें वही सवाल पूछ रही हैं—“मुख्यमंत्री जी, अगर छात्रों की आवाज सचमुच आपकी जिम्मेदारी है, तो उनकी आवाज तक पहुंचने से पहले लाठियां किसने खड़ी कर दीं?”
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)















